यदि ओबीसी की जाति-जनगणना नही हुयी तो 2021 की जनगणना के होगा विरोध’

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लखनऊ, 21 जून, 2021

ओबीसी महासभा के द्वारा ओबीसी की जाति जनगणना सीरीज का तीसरा वेबीनार ’शिक्षण संस्थानों में ओबीसी आरक्षण के साथ खिलवाड़’ विषय पर केंद्रित रहा।
आज के वेबिनार की अध्यक्षता महाराष्ट्र के प्रमुख सामाजिक एक्टिविस्ट नागेश चैधरी जी ने किया। प्रोग्राम में मुख्य वक्ता के रूप में दिल्ली यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर लक्ष्मण यादव और लोकसभा टीवी चैनल के पत्रकार श्री राजेश्वर जायसवाल जी ने संबोधित किया, साथ ही पूर्व आईएएस श्री राकेश वर्मा जी के साथ जेएनयू के पूर्व छात्र नेता, ऑल इंडिया बैकवर्ड स्टूडेंट फोरम के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं वर्तमान में उत्तर प्रदेश कांग्रेस के डिजिटल मीडिया के प्रमुख डॉ अनूप पटेल जी सहित कई वक्ताओं ने संबोधित किया।

आज के वेबिनार में कुछ प्रमुख बिंदुओं पर चर्चा हुई, जिसे डॉ अनूप पटेल जी ने रेखांकित किया है।

➡️जैसा कि कहा जाता है कि भारत में सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलन में ओबीसी वर्ग के नायकों की भूमिका नगण्य थी यह सरासर गलत है। आजाद भारत से पहले ही छत्रपति शाहूजी महाराज, महात्मा ज्योति राव फूले, दक्षिण में ईवी रामास्वामी पेरियार नायकर, उत्तर भारत में अर्जक संघ का आंदोलन, बिहार में त्रिवेणी संघ का आंदोलन, महामना रामस्वरूप वर्मा, जगदेव बाबू, पेरियार ललई यादव, चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु ने पूरे भारत सामाजिक सांस्कृतिक और राजनीतिक परिवेश को अपने ओजस्वी विचारों से बदल कर रख दिया था। देश के प्रमुख साहित्यकारों में से एक फणीश्वर नाथ रेणु ने किसानी परिवेश व ग्रामीण भारत का जो खाका खींचा है वह आज तक अद्वितीय है।

➡️देश में जब संविधान सभा का गठन हुआ था तो संविधान सभा में ही देश की पिछड़ी जातियों के अधिकार और हिस्सेदारी के लिए बहस हुई थी, जिसमें देश की बडी आबादी के कल्याण के लिए कुछ ठोस योजनाओं पर विस्तृत चर्चा हुई थी और इसी के आधार पर उस समय की सरकार ने काका कालेलकर कमीशन गठित किया था। काका कालेलकर कमिशन ने देश की पिछड़ी जातियों के लिए 45 प्रतिशत आरक्षण की संस्तुति की थी, लेकिन बाद में कमीशन के चेयरमैन खुद ही अपनी बात से मुकर गए और आरक्षण का आधार जाति की जगह आर्थिक असमानता बता दी। उस समय की सरकार ने भी काका कालेलकर कमीशन की सिफारिशों को लागू नहीं किया।

➡️इस बीच कई प्रमुख राज्यों में राजनीति में ओबीसी नेतृत्व का लगातार उभार हुआ और ओबीसी आरक्षण की लगातार मांग उठने लगी। सन 1980 में बी पी मंडल जी के नेतृत्व में मंडल कमीशन का गठन किया गया। मंडल कमीशन में पिछड़े वर्ग के हितों के लिए कई सारी सिफारिशें सरकार को सौंपी। तत्कालीन केंद्रीय सरकार मंडल कमीशन की सभी सिफारिशों को लागू नहीं कर पायी। ’केवल दो ही सिफारिशें लागू हुई’- केंद्रीय नौकरियों में 27 प्रतिशत ओबीसी के लिए आरक्षण व शिक्षण संस्थानों में ओबीसी अभ्यर्थियों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत कर दी थी इसलिए ओबीसी को केवल 27 प्रतिशत आरक्षण दिया गया। जबकि 1931 की जनगणना के अनुसार ओबीसी जातियों की संख्या 52 प्रतिशत थी तो अनुमान लगाइए कि आज कितनी संख्या होगी।

➡️मंडल कमीशन की कुछ सिफारिशें 1990 में लागू हुई जिसमें से प्रमुख था- केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में ओबीसी अभ्यर्थियों के 27 प्रतिशत आरक्षण।
ओबीसी वर्ग में मंडल कमीशन आने के बाद जैसे ही राजनैतिक-सामाजिक चेतना फैल रही थी वैसे हिंदुत्ववादी ताकतों ने कमंडल का राग छेड़ दिया और जो ओबीसी वर्ग को अपने हक और अधिकार हिस्सेदारी के लिए लड़ना चाहिए था वह मंदिर आंदोलन और मंदिर बनाने के लिए कूद पड़ा, नतीजन ओबीसी वर्ग अपना खुद का नुकसान कर बैठा।

➡️ 2020 के आंकड़ों के अनुसार 40 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में यदि ओबीसी वर्ग के शिक्षकों के आंकड़ों पर नजर डालें तो विश्वविद्यालयों में सबसे कम ओबीसी वर्ग के प्रोफेसर हैं। अभी तक प्रोफेसर के 269 पद निर्धारित किए गए हैं जिस पर मात्र 9 ओबीसी वर्ग के प्रोफेसर कार्यरत हैं जबकि 260 पद खाली हैं। एसोसिएट प्रोफेसर के 544 पदों में सिर्फ 31 पदों पर ओबीसी वर्ग के शिक्षक कार्यरत हैं और 513 पद खाली हैं। असिस्टेंट प्रोफेसर के 2178 पदों में मात्र 1267 पद भरे गए हैं और 911 पद खाली हैं। यह है केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में ओबीसी वर्ग के शिक्षकों की हकीकत। देश के किसी भी यूनिवर्सिटी में अभी तक ओबीसी वर्ग का कोई वॉइस चांसलर नहीं हुआ है।

➡️उच्च शिक्षा संस्थानों में मंडल कमीशन के लागू होने के साथ ही सुपर स्पेशलिटी संस्थानों में ओबीसी आरक्षण को डिबार कर दिया गया। यह ओबीसी वर्ग के साथ बहुत बड़ी नाइंसाफी थी कि जो देश के प्रमुख संस्थान हैं उसमें से यदि ओबीसी आरक्षण को लागू नहीं किया जाएगा तो इन वर्गों की हिस्सेदारी वहां कैसे होगी।

➡️ उच्च शिक्षा के स्तर पर जैसे कि पीएचडी प्रोग्रामों में ओबीसी वर्ग के अभ्यर्थियों की उपस्थिति भी नगण्य होती जा रही है। एक ओबीसी अभ्यर्थी के लिए शिक्षण संस्थानों में नौकरी पाना बालू में से तेल निकालने जैसा है।

➡️नौकरियों के लिए विभिन्न आयोग, संस्थाये जब विज्ञापन निकालते है तो उस पर पहले ओबीसी वर्ग के लिए ’नॉट अवेलेबल’ का क्लाज लगा देती है फिर यदि ओबीसी वर्ग के अभ्यर्थी इंटरव्यू देते हैं तो रिजल्ट में ’नॉट फाउंड सूटेबल (छथ्ै)’ का क्लाज लगा देते हैं और इस तरीके से शिक्षण संस्थानों से ओबीसी वर्ग के अभ्यर्थियों को बाहर कर दिया जाता है। केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में पूरी तरीके से मनुवादी व्यवस्था कायम है। अभी केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में ओबीसी को अपनी हिस्सेदारी के लिए बड़ी लड़ाई लड़नी पड़ेगी।

➡️वर्तमान सरकार द्वारा प्रस्तावित न्यू एजुकेशन पॉलिसी में सिफारिश की गई है कि देश के सभी प्रमुख शिक्षण संस्थानों को निजी हाथों में सौंप दिया जाये, ताकि शिक्षा की गुणवत्ता में बेहतरी लाई जा सके। यह पूरी तरीके से शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की व्यवस्था को कुठाराघात करने जैसा है। जब शिक्षण संस्थान निजी हाथों में चले जाएंगे तो आरक्षण लागू होने की संभावना ना के बराबर होगी। जिससे भविष्य में आरक्षित वर्ग यानी दलित पिछड़े और आदिवासी समुदाय के प्रोफेसर नहीं नजर आएंगे।

वर्तमान में केंद्र स्तर और राज्य स्तर की नौकरियों के लिए यदि ओबीसी का अभ्यर्थी रिजर्व कैटेगरी से फॉर्म भरता है तो फाइनल रिजल्ट में ही उसे रिजर्व कैटेगरी के ही अंदर रखा जाता है। आप देखते होंगे कि ओबीसी कैटेगरी का कट-ऑफ इस समय सामान्य वर्ग से ज्यादा हो जाता है, वहीं दूसरी तरफ हम देखते हैं कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10 प्रतिशत ईडब्ल्यूएस आरक्षण प्रस्तावित कर दिया गया। और इसके लिए यह इस वर्ग ने कोई लड़ाई नहीं लड़ी। इस प्रकार से 50 प्रतिशत सामान्य वर्ग और 10 प्रतिशत आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों का आरक्षण यानी 60 प्रतिशत आरक्षण देश के सवर्ण वर्गों के लिए अघोषित रूप से आरक्षित कर दिया गया है।

➡️वर्तमान सरकार द्वारा देश में ओबीसी वर्ग को आपस में लड़ाने का प्रयास किया जा रहा है। जस्टिस रोहिणी कमीशन के द्वारा ओबीसी आरक्षण को तीन भागों में विभाजन करने की योजना चल रही है। जस्टिस रोहिणी कमीशन कई बार यह बता चुका है कि उसके पास आंकड़ों का भाव है। आंकड़े तब आएंगे जब ओबीसी की जाति जनगणना होगी। एक तरफ केंद्रीय सरकार ओबीसी की जाति-जनगणना नहीं करवाना चाहती, दूसरी तरफ ओबीसी आरक्षण को तीन भागों में विभाजित करना चाह रही है।
इसलिए सबसे पहले हमें यह मांग करनी चाहिए कि जब तक ओबीसी की जाति जनगणना नहीं होगी तब तक जाति जनगणना के आंकड़े जारी ना की जाए।

➡️ओबीसी वर्ग के युवाओं के बीच विभिन्न हिंदुत्ववादी संगठन धार्मिक चेतना को बढ़ाने का लगातार प्रयास कर रहे हैं जिससे उनके अंदर शिक्षा और अपने हक और अधिकार के लिए लड़ने के मात्रा में कमी आए और वह धार्मिक गुलामी को स्वीकार करें अपने हक और अधिकारों को भूल कर एक खास पार्टी को वोट देना शुरू कर दें और इसके लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) लगातार प्रयास कर रहा है। सन् 2015 में बिहार विधानसभा के पिछले चुनाव के समय आर एस एस के प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण के खिलाफ एक बड़ा बयान जारी किया था इसकी प्रतिक्रिया के स्वरूप बिहार में बड़ा राजनीतिक परिवर्तन हुआ था और भाजपा को करारी हार मिली थी। हालांकि आरएसएस अपने मंसूबे पर लगातार काम कर रहा है क्योंकि आर एस एस के सामने ओबीसी वर्ग के अंदर सांस्कृतिक शैक्षिक और धार्मिक चेतना जगाने के लिए संगठनों का अभाव है जिसके चलते आर एस एस के सांस्कृतिक व धार्मिक कुचक्र में युवा वर्ग फंसता जा रहा है।

➡️ इस समय नौकरियों में तथा शिक्षण संस्थानों में ओबीसी वर्ग के उन्हीं कैंडीडेट्स का चयन हो रहा है जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से आर एस एस और उसके अनुषांगिक संगठनों से जुड़े हुए होते हैं। यह एक तरीके से ओबीसी वर्ग के लिए विभीषण का काम करते हैं। ये ओबीसी वर्ग के हितों के खिलाफ और आर एस एस के साम्प्रदायिक व सवर्णवादी एजेंडे को पूरा करने का प्रयास करते हैं।

➡️हालांकि भाजपा ओबीसी वर्ग की छोटी-छोटी जातियों को लगातार जोड़ने का प्रयास कर रही है और उन्हें राजनीतिक हिस्सेदारी देने का दिलासा देती है। बिहार और उत्तर प्रदेश में सफल भी हुए हैं लेकिन इन पिछड़ी जातियों के युवा वर्ग का मोह-भंग भी हो रहा है क्योंकि नौकरियां नहीं है।

➡️ आने वाले समय में इन वर्गों के युवाओं को लगातार जोड़ा जाए और इनके बीच शैक्षिक और राजनैतिक चेतना स्थापित किया जाए ताकि वह मंडल के लिए लड़े ना कि कमंडल के लिए।

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