मनकामेश्वर घाट-उपवन में जरूरतमंदों को दिया गया राशन *

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लखनऊ। ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि पर रविवार 20 जून को गंगा दशहरा के पावन पर्व पर डालीगंज स्थित प्रतिष्ठित मनकामेश्वर मठ-मंदिर में स्थापित देवी मां गंगा का आरती-पूजन, मठ-मंदिर की श्रीमहंत देव्यागिरि ने विधिविधान से किया। इस अवसर पर मनकामेश्वर घाट उपवन में जरूरतमंदों को राशन का वितरण किया गया और ट्रामा सेंटर के सुरक्षा कर्मियों को कोरोना योद्धा सम्मान से अलंकृत भी किया गया।

गंगा दशहरा के अवसर पर सुबह प्रथम देव गणपति के पूजन के उपरांत महादेव की आरती की गई। उसके बाद मंदिर परिसर में स्थापित माता गंगा का पूजन किया गया। लॉकडाउन के कारण सार्वजनिक आयोजन स्थगित कर दिये गए थे। ऐसे में मंदिर के सेवादारों की उपस्थिति में ही अभिषेक श्रंगार पूजन अर्चन किया गया। उसके बाद श्रीमहंत देव्यागिरि ने चौक स्थित ट्रामा सेंटर जाकर वहां के सुरक्षा कर्मियों को कोरोना योद्धाओं के रूप में तिलक लगाकर, पुष्पमाल भेंट कर सम्मानित किया। उन्होंने इस अवसर पर लोगों ने कहा कि कोरोना की तीसरी लहर से डरने की नहीं सजग रहने की जरूरत है। हर व्यक्ति इन सुरक्षा गार्ड की तरह मुस्तैद रहेगा तो तीसरी लहर विकराल रूप नहीं ले सकेगी। इसलिए यह दौर हर व्यक्ति को कोरोना योद्धा बनने का है। इस क्रम में उन्होंने डालीगंज के मनकामेश्वर घाट उपवन में जरूरतमंदों को नि:शुल्क राशन का वितरण किया। गंगा दशहरा पर दान पुण्य का विशेष महत्व होता है। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म से दान मानव धर्म से जोड़ा गया है। कोरोना संकटकाल में दान कर्म आवश्यक अनुष्ठान के रूप में किया जाना चाहिए। हर व्यक्ति का यह दायित्व है कि वह यह सुनिश्चित करे कि उसके आसपास कोई भूखा न सोने पाए। यह कठिन दौर अर्थाजन का नहीं पुण्यार्जन का है। इससे यह लोक ही नहीं परलोक भी बेहतर होगा। इस अवसर पर कल्याणी गिरि, गौरजा गिरि, रीतू गिरि, उपमा पाण्डेय, रीता श्रीवास्तव, तुलसी पाण्डेय, ज्योति, नेहा, अभिषेक, अमन, रामदुलारी, धीरू, साहिल सहित अन्य ने सेवाएं दी।

श्रीमहंत देव्यागिरि ने बताया कि देव नदी गंगा का पावन स्पर्श पाकर वाराणसी, हरिद्वार और प्रयागराज तीर्थ बन गए है। मकर संक्रांति, कुम्भ और गंगा दशहरा के अवसर पर स्नान कर लोग पाप मुक्ति और मोक्ष की कामना करते हैं। मान्यता के अनुसार भगवान ब्रह्मा ने भगवान विष्णु के पैर के पसीने की बून्दों से गंगा का सृजन किया था। पृथ्वी पर अवतरण के समय भगवान शिव ने देवी गंगा को अपने सर की जटाओं में समाहित किया था। ऐसे में देवी गंगा के माध्यम से त्रिदेवों की सहज आराधना संभव हो जाती है। महंत देव्यागिरि ने बताया कि मान्यता के अनुसार गंगा सप्तमी के दिन देवीमां गंगा, स्वर्ग से भगवान शिव की जटाओं में समायी थीं। इसके बाद ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी को गंगा दशहरे पर देवीमां गंगा, धरती पर प्रवाहित हुई थीं। गंगावतरण की प्रचलित कथा के अनुसार अयोध्या के राजा सगर के अश्वमेघ यज्ञ को असफल करने के लिए देवराज इन्द्र ने उनके अश्व को महर्षि कपिल के आश्रम में छिपा दिया था। जब राजा सगर के साठ हजार पुत्रों ने वहां पहुंच कर महर्षि की तपस्या में खलल डाली तो महर्षि ने सभी को भस्म कर दिया। ऐसे में देव नदी गंगा को धरती पर लाने के लिए राजा सगर, अंशुमान और दिलीप ने तपस्या की पर वह असफल रहे। अंत में महाराज दिलीप के बेटे भगीरथ की तपस्या सफल हुई।

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