चेस्ट काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा वेबिनार का आयोजन

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चेस्ट काउंसिल ऑफ इंडिया के तत्वावधान में 24/6/2021 को “एक नदी की उत्पत्ति, एक संत की उत्पत्ति और कोविड 19 के मूल देश हमेशा रहस्यमय रहे हैं“ पर एक वेबिनार का आयोजन किया गया। डा0 सूर्यकांत, प्रोफेसर और प्रमुख, रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग, किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी, लखनऊ, इस वेबिनार के मॉडरेटर थे। आईएमए-एएमएस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डा0 सूर्यकान्त द्वारा एक अद्भुत व्याख्यान के बाद इस विषय पर चर्चा के लिए, भारत के प्रख्यात पल्मोनोलॉजिस्ट, मुंबई से डा0 अमिता नेने और डा0 अगम वोरा, बेंगलुरु से डा0 बी वी मुरली मोहन, डा0 एनएच कृष्णा कर्नाटक के दावणगेरे से और कोलकाता से डा0 राजाधर शामिल हुए। वर्चुअल प्लेटफॉर्म पर वेबिनार में लगभग 10,000 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
इस वेबिनार के संक्षिप्त समापन बिंदु निम्नलिखित है:-
1. जब तक वायरस की उत्पत्ति का तरीका स्पष्ट नहीं है, वर्तमान महामारी को समाप्त करने का कोई तरीका नहीं है, न ही भविष्य में ऐसी आपदाओं को रोका जा सकता है। यह वेबिनार गलती खोजने का अभ्यास नहीं है बल्कि एक तथ्य खोजने वाला है, क्योंकि केवल तथ्यों के आधार पर ही इस महामारी को समाप्त किया जा सकता हैं।
2. पैनल चर्चा के दौरान कोविड-19 की उत्पत्ति के चार सिद्धांतों पर चर्चा की गई- प्राकृतिक उत्पत्ति, लैब रिसाव, आनुवंशिक हेरफेर और खाद्य शीत श्रृंखला सिद्धांत।
3. इस संक्रमण से मचे त्राहिमाम से पहले ही कई शोध पत्र प्रकाशित हुए थे, जो यह साबित करने की कोशिश कर रहे थे कि यह वायरस प्राकृतिक है, जैसे- ’’चोर की दाढ़ी में तिनका’’। समय से पहले अपनों को खोने वाले लोगों में बहुत गुस्सा और पीड़ा होती है, इसलिए मूल देश से पारदर्शिता और जवाबदेही ही इस पीड़ा को जल्द ही कम कर सकती है।
4. पशु या खाद्य शीत श्रृंखला हो, वायरस की प्राकृतिक उत्पत्ति के लिए दिये गये हर सिद्धांतों के आधार पर कोई ठोस सबूत खोजने में विफल रहे है। कोविड-19 के लिए उत्पत्ति के अन्य सिद्धांत अंततः कृत्रिम उत्पत्ति की ओर इशारा करते हैं।
5. बहुकेंद्रीय प्रयोगशालाओं में वायरस संरचना के विस्तृत अध्ययन में किसी भी ज्ञात सार्स वेरिएंट के साथ रासायनिक विन्यास में कोई समानता नहीं पाई गई है। यह बार-बार इस तथ्य की ओर इशारा करता है कि वायरस की उत्पत्ति प्राकृतिक रूप से नहीं हुई थी।
6. इसी देश के वैज्ञानिकों ने जल्द से जल्द वैक्सीन विकसित करने का दावा किया। क्या इसलिए कि वे वायरस के क्रम को पहले से जानते थे?
7. वुहान जैसे अनुसंधान प्रयोगशालाओं को अनुसंधान करने के लिए जिम्मेदार होना चाहिए। मानव जाति की भलाई के लिए अनुसंधान के बीच एक पतली रेखा है, और एक जो अगर अव्यवस्थित हो जाती है, तो इसका परिणाम महामारी हो सकता है। पूरी दुनिया के लिए पारदर्शिता और जवाबदेही सर्वोपरि है।
8. महामारी ने चीन को आधिकारिक तौर पर उनके द्वारा रिपोर्ट किए जाने की तुलना में अधिक प्रभावित किया है। और वर्तमान में अलग अलग वेरिएंट के साथ एक दूसरी (या तीसरी) लहर देख रहे हैं लेकिन फिर से वे शायद कम रिपोर्टिंग कर रहे हैं। इसलिए मूल देश महामारी से नहीं बचा, लेकिन पर्याप्त अंतरराष्ट्रीय जांच से बच रहा है।
9. यह सोचनीय विषय है कि वायरस की उत्पत्ति का देश इस बीमारी को इतनी अच्छी तरह से लड़ने में सक्षम है, जबकि बाकी दुनिया अभी भी त्रासदी से जूझ रही है। चीन की महामारी की रोकथाम के मंत्रों को पूरी दुनिया से साझा किया जाना चाहिए, ताकि मानवता को बचाया जा सक।
हमारे प्रख्यात पैनलिस्टों द्वारा उपरोक्त सभी बिंदु मूल्यवान हैं और यह प्रत्येक श्रोता के लिए आंख खोलने वाला था जिसने उन्हें कोविड की उत्पत्ति के बारे में सोचने और अधिक जानने के लिए प्रेरित किया है।
“केवल शत्रु के बारे में ज्ञान ही शत्रु को परास्त करने में सहायक हो सकता है।“

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