क्या मध्यम वर्ग के लोग देश के नागरिक नहीं हैं?

0
101

।यह सवाल भी है और यह एक ऐसा विषय है जिस पर विचार करने की जरूरत भी है क्योंकि पिछले साल मार्च 2020 से जो कोरोना संक्रमण का काल शुरू हुआ है तो तकरीबन सवा साल हो गया इस सवा साल में देश की क्या स्थिति रही है सब जानते हैं सरकार भी इससे बखूबी वाकिफ है लेकिन देश में रह रहा मध्यमवर्ग कैसे जी रहा है इस पर भी सरकार को और करना चाहिए।
उच्च वर्ग के लोग तो धनी और अमीर होते हैं उनको पैसे की कोई कमी नहीं वह तो आराम से देश से भाग भी सकते हैं या देश में ही रहकर सरकार की गोद में बैठ कर दो दूनी चार कर सकते हैं।
निम्न वर्ग या जिसको मजदूर वर्ग कहा जाए इनको भी कोई दिक्कत नहीं क्योंकि ये लोगों से मदद मांग सकते हैं और दैनिक कार्यों में अपने हिसाब से मजदूरी लेकर जीवन यापन कर सकते हैं इसके अलावा कथित रूप से जो सरकार की तरफ से सहायता की बात की जाती है उसमें राशन कार्ड धारकों की बात होती है जो निम्न वर्ग से आते हैं।
लेकिन जो मध्यम वर्ग के लोग हैं जो अपना छोटा मोटा व्यवसाय करते हैं किसी की दुकानें हैं किसी के छोटे-छोटे व्यवसाय हैं कोई कोचिंग चलाता है कोई बच्चों को ट्यूशन पढ़ाता है यह सब मेहनत करके अपना अपने परिवार का पेट पालते हैं ऐसे मध्यम वर्ग के लोग जिनकी आमदनी कम होती है वह लोन लेकर ईएमआई पर अपना घर सजाने की कोशिश करते हैं बहुत से मध्यम वर्ग के लोग किराए के मकान में रहते हैं बच्चों की फीस, किताबें, घर का खर्चा, लोन की किस्त, मकान का किराया, बिजली, सिलेंडर इन सब का खर्च अपनी लिमिटेड आमदनी से करते हैं। अधिकतम मध्यम वर्ग के लोगों की जिंदगी लोन और किस्तों पर निर्भर करती है। उनके ऊपर दबाव रहता है।
अब जबकि पिछले लगभग सवा साल से लॉकडाउन के कारण दुकाने व्यवसाय कोचिंग्स प्रतिष्ठान सब लगातार बंद चल रहे हैं ऐसे में एक मध्यमवर्ग इंसान जिसकी आमदनी शून्य हो गई वह घर का किराया कहां से देगा, लोन की किस्त कैसे चुकाएगा, बच्चों की फीस कैसे जमा करेगा, बच्चों के लिए किताबों का प्रबंध कहां से करेगा, बिजली का बिल कैसे देगा, हर महीने सिलेंडर कहां से लेगा, आने जाने के लिए पेट्रोल डीजल कैसे भराएगा, एक तो उसकी आमदनी नहीं और दूसरे हर चीज के दाम आसमान पर पेट्रोल लगभग ₹100, सिलेंडर लगभग हजार रुपए, बिजली के बिल का दर काफी बढ़ा हुआ, किराया 10 से 12000 इससे कम में मकान नहीं, और उस पर से दुकान व्यवसायिक जगह प्रतिष्ठान और कोचिंग की बिल्डिंग का किराया वह कहां से अदा करेगा जब कि कारोबार ठप्प है। वह इंसान क्या खाएगा और कैसे जिंदगी बताएगा। यहां पर तो वही डायलॉग फिट होता है कि नंगा नहाएगा क्या निचोड़ेगा क्या!
सरकार के पास करोड़ों की मूर्ति अर्थात स्टैचू लगवाने का पैसा है, सेंट्रल विस्टा जिस पर तकरीबन 14 सौ करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं उसके बनवाने के लिए पैसा है, पार्टी के ऑफिस बनवाने के लिए पैसा है, प्रधानमंत्री के हेलीकॉप्टर खरीदने का पैसा है, सांसद एवं विधायक को जो जनता द्वारा चुने जाते हैं उनको हर सुविधा देने के लिए पैसा घर, मकान, गाड़ी, यात्रा, इलेक्ट्रिसिटी, सुरक्षा हर चीज के लिए सरकार के पास पैसा है। सरकार के पास अगर पैसा नहीं है तो सिर्फ और सिर्फ जनता की सुख सुविधाओं के लिए पैसा नहीं है।
जबकि भारत की जनता सरकार को टैक्स पर टैक्स अदा करती है और सरकार की जेब में भर्ती है। नागरिक पैसे कमाता है तो उस कमाए हुए साल भर के पैसे पर टैक्स अदा करता है और टैक्स देने के बाद जो टैक्स फ्री पैसा बचता है उससे जो भी काम करता है वह टैक्स देता है अगर गाड़ी खरीदता है तो उस पर टैक्स देता है पेट्रोल भरवाता है तो उस पर टैक्स देता है जमीन खरीदता है तो उस पर टैक्स देता है मकान बनाता है तो उस पर टैक्स देता है हर काम का वो टैक्स अदा करता है यानी टैक्स फ्री पैसे पर भी टैक्स दिया जाता है। और जो माननीय विधायक और सांसद महोदय, महापौर, पार्षद इत्यादि राजनीतिक लोग जनता की जेबों से लूट करके आनंद उठाते हैं। सोने की चिड़िया मिट्टी की चिड़िया कैसे बन गई इसको समझने की जरूरत है।
फिर भी हम कहते हैं।
सारे जहां से अच्छा हिंदुस्ता हमारा।
जयहिंद।

सैय्यद एम अली तक़वी
शिक्षाविद एवं वरिष्ठ पत्रकार लखनऊ

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here