हज़रत अली अलैहिस्सलाम, अदल व इंसाफ़ की तस्वीर।

    0
    139

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम शियों के पहले इमाम और मुसलमानों के चौथे ख़लीफा , एक अज़ीम शख्सियत। जिनकी विलादत काबे में और शहादत मस्जिद में हुई।
    21 तारीख, रमज़ानुल मुबारक की वह ग़मनाक तारीख़ कि जिसमें अरकाने हिदायत मुन्हदिम कर दिये गये। जिसकी फ़ज़ीलतों का ये आलम की काबे में विलादत हुई। अल्लाह के रसूल ने जिसकों अपना वसी और जानशीन मुअय्यन किया। शबे हिजरत जो बिस्तरे रसूल पर सोया, जिसकी शान में आयाते र्कुआनी नाज़िल हुई, जो यतीमों मिस्कीनों का सहारा था। उसी अज़ीम शख़्सियत को रमज़ानुल मुबारक के महीने में जो कि रहमतों और फ़ज़ीलतों का महीना है, जिसके दिन तमाम दिन से अफ़ज़ल और जिसकी रातें तमाम रातो से अफ़ज़ल जिस महीनें में ख़ुदा की रहमतें नाज़िल होती है, और जिस महीने की सबसे अफ़ज़ल तरीन शब शबे क़द्र है उसी रहमतों के महीने में शबे क़द्र की सुब्ह को वलीए ख़ुदा पर ये जुल्म कि दौराने नमाज़ हालते सजदा में ज़हर आलूद ज़रबत से सर शिगाफ़्ता कर दिया गया। उन्नीस रमज़ान की वह तारीख़ थी कि जब फ़ात्मा के घर में एक बार फिर गिरया ओ ज़ारी की आवाज़ें बलन्द हुई, इब्ने मुल्जिम ने ज़हर आलूद तलवार से वसीए रसूल के सरे अक़दस पर ऐसा वार किया के सर दो पारा हो गया। मुसल्ला ख़ून में तर हो गया। और अल्लाह के वली की ज़बान पर बस एक जुमला था ‘‘फुज़तो बे रब्बिल काबा’’ काबे के रब की क़सम मैं कामयाब हो गया। तारीख़ में मिलता है कि जिस उन्नीस रमज़ान की तारीख़ में आपके सर पर ज़रबत लगी उस रात आप अपनी बेटी जनाबे उम्मे कुलसूम के यहां मेहमान थे। जनाबे उम्में कुलसूम फ़रमाती है कि बाबा ने नमक से इफ़्तार किया और तीन लुक़्मों से ज़्यादा नही खाया और फिर इबादत में मशगूल हो गये। रवायात में मिलता है कि उस रात आप बेदार रहे और कई बार आप कमरे से बाहर आकर फ़रमाते थे ‘‘ख़ुदा की क़सम मेै झूठ नही कहता और ना ही मुझसे झूठ कहा गया है, यही वह रात है, जिसमें मुझे शहादत का वादा किया गया है’’। 19 रमज़ानुल मुबारक सन 40 हि0 वक़्ते सहर जब आप मस्जिद जाने लगे तो मुरग़ाबियों ने आपको घेर लिया और फ़रयाद करने लगी जब लोग उन्हें हटाने लगे तो आपने फ़रमाया इन्हें छोड़ दो ये नौहा कर रही है। हज़रत अली अलै0 मस्जिद में तशरीफ़ लाए और सोए हुए अफ़राद को नमाज़ के लिए जगाया और बिलख़ुसूस इब्ने मुलजिम को जो कि इमाम अलै0 का क़त्ल का इरादा किए तलवार छुपाए हुए पुशत के बल लेटा हुआ था उसे बेदार किया और नमाज़ पढ़ने को कहा। और फिर मामूल के मुताबिक़ आपने दो रकअत नमाज़ अदा की फिर गुलदस्तए अज़ान पर तशरीफ़ ले गये अज़ान दी आपकी अज़ान की आवाज़ का बलन्द होना था लोग मस्जिद में आने लगे सफ़ें तैयार होने लगी इब्ने मुलजिम सुतून की आड़ में आपके पीछे खड़ा हो गया इमाम अलै0 ने नमाज़ पढ़ाना शुरू की अभी आप पहली रकअत के पहले सजदे से सर उठाना ही चाहते थे के इब्ने मुलजिम ने आपके सर पर ऐसी ज़रबत मारी के सर दो पारा हो गया मीर अनीस लिखते है कि
    ‘‘सर हो गया दो टुक़ड़े मुहम्मद के वसी का
    फिर दूसरे सजदे को उठा सर ना अली का।
    नमाज़ियों में कोहराम बरपा हो गया इमाम अलै0 सर में ख़ाक डालते जाते और कहते जाते ‘‘फुज़्तो बे रब्बिल काबा’’ काबे के रब की क़सम मैं कामयाब हो गया। जिब्ररईल ने ज़मीनो आसमान के दरम्यिान सदाए फ़रयाद बलन्द की ‘‘ख़ुदा की क़सम हिदायत के अरकान मुन्हदिम हो गये , निशाने तक़वा बुझ गया, ऐतमाद भरी रस्सी टूट गई, रसूल के चचेरे भाई क़त्ल कर दिये गये, अमीरूनमोमिनीन अली ए मुर्तज़ा क़त्ल कर दिये गये, आपको सबसे बदतरीन शख़्स ने क़त्ल किया’’। जिब्ररईल की आवाज़ का फ़िज़ा में गूंजना था कि इस आवाज़ से कूफ़े की दरो दीवार हिल गई, लोग बेताब होकर घरों से बाहर निकल आये और देखते ही देखते मस्जिदे कूफ़ा में चाहने वालों का हुजूम लग गया। लोग सरों सीना पीट रहे थे। आफ़ताबे इमामत मस्जिदे कूफ़ा की मेहराब में गुरूब हो रहा था। अली क़त्ल हो गये यानि ईमान क़त्ल हो गया, अली क़त्ल हो गये यानि अदलो इंसाफ़ का ख़ून हो गया, यानि वह निज़ामें हुकूमत ढा दी गई जिसमें किसी का हक़ नही मारा जाता था। हज़रत अली अलै0 ज़ख़्म की वजह से ख़ुद नमाज़ पढ़ाने की कुव्वत नही रखते थे तो आपने अपने फ़र्ज़न्द इमाम हसन अलै0 को नमाज़े जमाअत जारी रखने का हुक्म दिया और ख़ुद बैठकर नमाज़ अदा की। यहां पर ग़ौर तलब बात ये है कि ज़ख़्मी होने के बावजूद हज़रत अली अलै0 को नमाज़ की फ़िक्र है और बेटे ने किस तरह से नमाज़ तमाम करवाई होगी के सामने ख़ून आलूद ज़ख़्मी बाप पड़ा है। नमाज़ तमाम हुई चाहने वालें ज़ख़्मी इमाम को कंबल में लपेटकर घर लेकर चले जब घर क़रीब आने लगा तो हज़रत अली अलै0 ने इमाम हसन अलै0 से फ़रमाया बेटा मेरे चाहने वालों से कह दो के अब वापस लौट जाये इसलिए के मेरे ग़म में मेरी बेटियां गिरया कर रही होगी ऐसा न हो के उनके रोने के आवाज़ें नामहरमों के कानों मे जाए। इमाम अलै0 को घर में लाया गया घर पहुंचने के बाद लोग इब्ने मुलजिम को ढूंढकर लाये और हज़रत अली अलै0 के सामने पेश किया सुबह से भागते भागते इब्ने मुलजिम की ये हालत थी के प्यास की वजह से बार बार अपने होठों पर ज़बान फेर रहा था। रहमदिल इमाम से उसकी ये हालत देखी ना गई तो जो शरबत इमाम अलै0 के लिया लाया गया था वह इब्ने मुल्जिम को दे दिया। आपके रहमों करम और मसावात पसंदी का ये आलम था के आपने अपने दोनों बेटों इमाम हसन और इमामे हुसैन अलै0 को हिदायत फ़रमाई, कि ये हमारा कै़दी है इसके साथ कोई सख़्ती ना करना, जो कुछ ख़ुद खाना वह उसे खिलाना, अगर मैं सेहतयाब हो गया तो मुझे एख़्तिेयार है के चाहे इसे सज़ा दूं या माफ़ कर दूं, और अगर मैं दुनिया में ना रहा और तुम इससे इंतेक़ाम लेना चाहो तो इसे एक ही ज़रबत लगाना क्यूंकि इसने मुझे एक ही ज़रबत लगाई हैं और हरगिज़ इसके हाथ पांव वग़ैरह क़ता ना करना क्यूंकि ये इस्लामी तालीम के ख़िलाफ़ है। इमाम अलै0 के इस रवय्ये को देखकर इब्ने मुलजिम के आंखों में आंसू आ गए। और वह अपने आपको मलामत करने लगा के इतना मेहरबान इमाम कि अपने क़ातिल को भी प्यासा न देख सका उस इमाम को इतनी ज़हर आलूद तलवार से क़त्ल किया है कि अब इमाम के बचने के कोई आसार नही। तबीब बुलाए गए मगर कोई इलाज कारगर न हुआ। जर्राह ने बताया के ज़ख़्म बहुत गहराई मे उतर गया है अब इमाम अलै0 का बचना मुश्किल है। ज़रबत लगने के बाद आप चालीस घंटे ज़िन्दा रहे और जब ग़श से कुछ इफ़ाक़ा होता तो नसीहत और वसीयत फ़रमाते रहते। दुनिया से रूख़सत होने से पहले आपने अहले ख़ाना को जमा किया और इमामे हसन इमामे हुसैन अलै0 के लिए अपनी औलाद से मुख़ातिब होकर फ़रमाया कि हसनैन की ताज़ीम करना तुम पर वाजिब है कि वह फ़र्ज़न्दे रसूल हं। हज़रत अली अलै0 अपनी ज़िन्दगी के आखिरी लम्हात में भी लोगों की इस्लाह की तरफ़ मुतवज्जे थे। आपने अपने बेटों अज़ीज़ों और तमाम मुस्लमानों से इस तरह वसीयत फ़रमाई। मैं तुम्हें परहेज़गारी की वसीयत करता हूं, कि तुम अपने उमूर मुनज्ज़म करो, और हमेशा लोगों के दरम्यिान इस्लाह की फ़िक्र करते रहो, यतीमों को फ़रामोश ना करों, पड़ोसियों के हुकूक़ की रिआयत करो, र्कुआन पर अमल करो, नमाज़ की बहुत ज्यादा फ़िक्र करो क्योंकि ये तुम्हारे दीन का सुतून है। हज़रत अली अलै0 दो दिन तक बिस्तरे बीमारी पर दर्दों तकलीफ़ के साथ करवटें बदलते रहे आख़िर कार ज़हर का असर ज़िस्म में फैल गया और 21 रमज़ान को नमाज़े सुब्ह के वक़्त आपकी रूह जिस्म से परवाज़ कर गई हज़रत इमाम हसन और इमामे हुसैन अलै0 ने तजहीज़ो तकफ़ीन के बाद आपके जिस्मे अतहर को नजफ़े अषरफ़ में सुपुर्दे ख़ाक किया।

    शम्मे फ़रोज़ा
    सरफराजगंज
    लखनऊ

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here