विद्याधनं सर्व धनं प्रधानम् :प्रधानाचार्य हाजी महबूब हुसैन

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शिक्षा-शिक्षक-शिक्षक-दिवस
पांच सितम्बर एक अत्यन्त महत्वपूर्ण दिवस है। वास्तव में यह दिवस भारत के एक महान शिक्षक एवं भूतपूर्व राष्ट्रपति डा0 सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म दिवस है। जिसका राष्ट्रोत्थान में महान योगदान है जो शिक्षा एवं शिक्षकेां के प्रेरणा केन्द्र रहे।
जिस प्रकार भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने बच्चों के प्रति अपना हार्दिक प्रेम प्रदर्शित करते हुए अपने जन्मदिन को समर्पित किया उसी प्रकार से भारत के द्वितीय राष्ट्रपति डा0 सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने अपना हार्दिक प्रेम एवं सम्मान शिक्षकों को समर्पित किया। इसीलिये प्रत्येक वर्ष पाँच सितम्बर को शिक्षक दिवस हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
जिस प्रकार शहनाई कहते ही भारत रत्न शहंशाहे शहनाई उस्ताद विस्मिल्लाह खाँ याद आते हैं उसी प्रकार से शिक्षक कहते ही विश्वविख्यात भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपतित डा0 सर्वपल्ली राधाकृष्णन याद आते हैं। जो शून्य से शिखर तक पहुंचे एवं भारतवर्ष को भी विश्व गुरू के रूप में स्थापित करने में सफल रहे। यद्यपि भारत में अनेक विद्वान, शिक्षाविद हुये हैं, जिनमें स्वामी विवेकानन्द , नोबेल प्राइज विजेता रविन्द्र नाथ टैगोर, डा0 जाकिर हुसैन, सर सैयद अहमद खाँ, पण्डित मदन मोहन मालवीय, मिज़ाइल मैन ‘ए.प.जे. अब्दुल कलाम, सरोजिनी नायडू एवं ईश्वर चन्द विद्यासागर इत्यादि स्मरणीय एवं सराहनीय हैं। इसी प्रकार आश्रम पद्धति से शिक्षा प्रदान करने वालों में महर्षि वाल्मिकि, विश्वामित्र, गुरू वशिष्ट, स्वामी रामकृष्ण परम हंस, महर्षि दयानन्द सरस्वती एवं कबीर दास के गुरू रामानन्द आदि पूज्य हैं।
डा0 सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म एक सामान्य कृषक परिवार में हुआ था शिक्षोपरान्त वह एक प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक नियुक्त हुए। अपनी विद्वत्ता से वह न केवल अपने राज्य में प्रसिद्ध एवं सम्मानित हुए अपितु राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रसिद्ध एवं सम्मानित हुए। यही नहीं वह अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सुविख्यात हुए। वह विदेश में भी शिक्षा प्रदान करने जाते थे़, । उनकी पहचान एक महान विद्वान, दार्शनिक एवं भारतीय प्रवक्ता के रूप में सराहनीय है। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफेसर आफ फिलास्फी’ के पद पर रहते हुये शिक्षा प्रदान की। ‘आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय’ में वह प्रोफेसर आफ इस्टर्न रिलीजन ऐण्ड एथिक्स’ के पद पर रहते हुए शिक्षा प्रदान करते रहे। वह ‘काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के उप-कुलपति एवं युनाइटेड स्टेट्स आफ सोवियत रसिया (रूस) में भारतीय राजदूत भी रहे तत्पश्चात भारत के राष्ट्रपति पद पर आसीन रहे।
उनके द्वारा अनेक पुस्तकें लिखी गयी, जिनमें मुख्य रूप से ‘भारतीय दर्शन’, ‘जीवन के प्रति हिन्दू दृष्टिकोण’, ‘पूर्वी धर्म एवं पाश्चात्य विचार’ तथा ‘उपनिषद के दार्शनिक दृष्टिकोण’ तथा ‘‘सत्य ज्ञान’ अति प्रभावकारी एवं लाभप्रद पुस्तकें हैं। जिनको पढ़ने से ज्ञान में वृद्धि एवं मानसिक संतुष्टि प्राप्य है।
जिस प्रकार नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने स्वतन्त्रता प्राप्ति हेतु देशवासियों से कहा था ‘तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दिलाऊँगा’ “Give me blood I ,ll give you freedom ” उसी प्रकार से डा0 सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने भारतीयों से आह्वान किया था- ‘आप मुझे अच्छी महिलायें प्रदान करें हमारे पास महान नागरिक्ता होगी’ “Give us good women , we will have a great civilization ” और आप हमें अच्छी मातायें दो, हमारे पास महान राष्ट्र होगा’(Give us good mothers we will have great nation)उन्होंने भारत के विकास के लिये नारियों के शिक्षित होने को अपरिहार्य बताया था।
वर्तमान में विश्व में हर क्षेत्र में नारियाँ अपनीे पताका, लहरा रही हैं। अर्थात् शिक्षित नारियाँ जल-थल एवं वायुमण्ल में पुरुषों की भाँति कार्यकुशलता का परिचय दे रही हैं। दुर्गम पर्वतारोहण हो, सामुद्रिक जलयान हो, वायुयान चालन हो, स्थलीय रणक्षेत्र हो अथवा अन्य कार्यस्थल हो सर्वत्र विराजमान हैं।अतः नारी शिक्षा राष्ट्र विकास के लिये अनिवार्य है। ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गदपि गरियसी’ अर्थात जनम देने वाली माँ और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है। वह अपने सम्मान, परिवार के सम्मान एवं राष्ट्र सम्मान हेतु सर्वस्व अर्पित करती है।
शिक्षक का महत्व बताते हुये कबीर दास ने हा था- ‘गुरू गोविन्द दोऊ खड़े काके, लागूँ पाय- बलिहारी गुरू आपने गोविन्द दियो बताय अर्थात् गुरू को पहले प्रणाम करूँगा क्योंकि गुरू ने ही ईश्वर को पहचनवाया है। दूसरे शब्दों में शिक्षक शून्य से शिखर तक पहुँचाने का मार्ग प्रशस्त करता है। इसलिये शिक्षकों का दायित्व है कि वो अपने को समझें और ऐसी शिक्षा प्रदान करें जिससे छात्र-छात्राओं का सर्वांगीण विकास हो क्योंकि कहा गया है गुरू ईश्वर के प्रतिनिधि होते हैं। कहा गया है-
‘गुर्रूब्रह्मा गुर्रूविष्णु गुर्रूदवो महेश्वरः।
गुरू साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।।
अर्थात् गुरू ही ब्रह्मा हैं, गुरू ही विष्णु हैं, गुरू ही महादेव (शिव) हैं। यहीं नहीं ‘गुरू साक्षात ईश्वर स्वरूप हैं अतः गुरू को नमस्कार है। क्योंकि ईश्वर ने सृष्टि संसारकी की है। उसी प्रकार गुरू या शिक्षक अनेक शास्त्रों की शिक्षा द्वारा किसी भी छात्र-छात्रा को सर्वगुण सम्पन्न बनाता है, जो अपने गुरू ज्ञान से सदकर्मों द्वारा सबका कल्याण करता है। यह भी कहा गया है कि ‘राजा पूज्यते देशे, विद्वान सर्वत्र पुज्येत’ अर्थात राजा की पूजा (सम्मान) देश में होती है परन्तु विद्वान गुरू की पूजा सभी जगह अर्थात देश-विदेश में भी होती है जैसाकि डा0 सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी का हुआ। अतः उनकी भावनाओं को मैं अपने शब्दों में प्रस्तुत कर रहा हूँ:-
ज्ञान का दीप जलाओ तो कोई बात बने।
मार्ग मुक्ति का दिखाओं तो कोई बात बने।।
धरती से आकाश तक भरा ज्ञान का भण्डार है।

ज्ञान विज्ञान का विधान बताओ तो कोई बात बने।।
ईष्र्या द्वेष घृणा से भला हो नहीं सकता।
दया प्रेम त्याग दिखाओ तो कोई बात बनेे।।
आज कल कुकर्मियों का बोलबाला है।
सुकर्मी उनको बनाओ तो कोई बात बने।।
शिक्षा और शिक्षक द्वारा ही राष्ट्र निर्माण होता है। शिक्षकों को राष्ट्र निर्माता कहते हैं। अतः शिक्षा का महत्व जानना अनिवार्य है। मैं शिक्षक हूँ अतः शिक्षा क्या है? इससे क्या लाभ प्राप्त होता है जानिये मेरे शब्दों में:-
समस्त रहस्यों के ज्ञान का आधार है शिक्षा
आदि शक्तियों के भण्डार का भण्डार है शिक्षा
ब्रह्माण्ड के संज्ञान का आधार है शिक्षा
वैश्विक विधा के मार्ग का द्वार है शिक्षा
मुक्ति या निर्वाण का आधार है शिक्षा
आचार एवं विचार का आधार है शिक्षा
जीवन-मृत्यु के संतुलन का आधार है शिक्षा
जीवन के प्रत्येक क्षेत्र की सफलता का मार्ग है शिक्षा
व्यक्तिगत-सामाजिक-राजकीय-राष्ट्रीय
अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान का आधार है शिक्षा
भौतिक आध्यात्मिक क्रियाओं का आधार है शिक्षा
नैतिक एवं सांस्कृतिक परम्पराओं का आधार है शिक्षा
अतः ये कहना अनुचित नहीं होगा कि शिक्षा ही ईश्वरीय शक्तियों की वह विधा है जो विभिन्न दुर्लभ स्वरूपों का दर्शन कराती है अपितु लोक परलोक दोनों को संवारती है। हीनता अशिक्षा पर आधारित है जबकि महानता प्राप्ति का आधर है शिक्षा। अतः शिक्षकों को व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक राष्ट्रीय एवं धार्मिक ज्ञान के साथ-साथ नागरिकता का ज्ञान सर्वोपरि रूप से प्रदान करना चाहिये। जेसा कि डा0 सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी ने प्रदान किया।
यह भी स्पष्ट करना समुचित होगा कि शिक्षक दृश्य-अदृश्य शक्तियों को प्राप्त करने का सर्वेत्तम साधन है। अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाने का सर्वश्रेष्ठ माध्यम है। इसलिये कहा गया है कि शिक्षक द्वारा प्राप्त विधा (ज्ञान) सर्वोत्तम धन है। ‘विद्या धनम सर्व धनम प्रधानम्’। विदेश में विद्या ही धन है। विदेशेषु धनम विद्या’। वास्तव में विद्या क्या प्रदान करती है? ‘विद्या ददाति विनयम् विनयाद् याति पात्रताम् पात्र त्वाद धनमाप्नोति धनाद धर्म:तत: सुखम् अर्थात शिक्षा विनम्रता प्रदान करती है। विनम्रता विश्वासपात्र बनाती है। विश्वासपात्रता से धन प्राप्त होता है। धन से धार्मिक (कल्याणकारी) कार्य होते हैं और इससे ही सुख प्राप्त होता है। यह ऐसा धन है जिसे न चोर चुरा सकता है न भाई बाँट सकता है और न शासक (राजा) छीन सकता है।
डा0 सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी ने शिक्षकों को अपना जन्मदिवस समर्पित करते हुये कहा था कि शिक्षार्थियों को ऐसी योग्यतायें प्रदान करो जिससे राष्ट्र निर्माण करने में सफलता अर्जित हो। क्योंकि ये ही राष्ट्र के भावी कर्णधार है और शिक्षक राष्ट्र निर्माता है। आइये हम सब मिलकर ये प्रण करें: (मेरे शब्दों में)
अज़मते वतन को अपने हम बढ़ायेंगे।
सबकी भलाई के लिये क़दम उठायेंगे।।
तालीम तरक्क़़ी की बेहतरीन राह है।
तालीम से ही ज़िन्दगी ख़ुश्तर बनायेंगे।।
शाने बुज़़ुर्गी भी बचाना बहुत जरूरी है।
शान बचाने की राह भी हम दिखायेंगे।।
बुजुर्गों की करें खिदमत बच्चों की परवरिश।
इन्सानियत का पाठ हम सबको पढ़ायेंगे।।
बनें बहादुर करें ग़रीबों की सब मदद।
वतन की आबरू को हम सब बचायेंगे।
मज़हब नहीं सिखाता किसी से भी दुश्मनी।
मुश्किल घड़ी में दोस्ती सबसे निभायेंगे।।
वतन के सरहदों पर तिरंगा फ़हरायेंगे।
दुश्मनाने हिन्द के हम छक्के छुड़ायेंगे।।
मिलेगी जिन्दगी में जितनी हमें फुर्सत।
इबादते ख़़ुदा में अपना दिल लगायेंगे।।
महबूब हुब्बुल वतनी कम नहीं ज़िहाद से।
मज़हबो मुल्क हेतु हम कुर्बान हो जायेंगे।।

  1. लेखक
    हाजी महबूब हुसैन
    प्रधानाचार्य
    सेंट अल हनीफ इण्टर कालेज
    सेमरा-पड़ाव, चन्दौली (उ0प्र0)
    भूतपूर्व सचिव भारत रत्न बिस्मिल्लाह खाँ (स्वर्गीय)
    शहंशाहे शहनाई-वाराणसी

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