मोहर्रम में….करबला वालों के अलावा दूसरों बुजु़र्गवाने दीन पर बयान क्यों..! करबला का इतिहास क्यों नहीं बताते…!

0
225

लेखक एस.एन.लाल

ये बात सबको पता है कि मोहर्रम यानि अज़ादारी क्यों…!, क्योंकि इमाम हुसैन (अ.स.) अपने नाना के दीन (इन्सानियत) को बचाने के लिए अपने पूरे ख़ानदान व दोस्तो के साथ कुर्बानी दी थी। यही वजह है, हर धर्म व मज़हब का आदमी मोहर्रम यानि अज़ादारी करता है।….मोहर्रम इमाम हुसैन (अ.स.) के नाम का पर्यावाची (सेनानम्स) बन गया है..फिर भी…!
एस.एन.लाल
लेकिन कुछ मुसलमान अपने बयान व मजलिस में इमाम हुसैन (अ.स.) के मसायब व फज़ायल बयान करने के बजाये..दूसरे ‘बुजु़र्गवाने दीन’ के फज़ाल व मसायब पढ़ते है। इस्लाम तो शहादतो और कुर्बानियों से भरा पड़ा है। अगर इमाम हुसैन (अ.स.) ने कुर्बानी न दी होती, तो सब ही की शहादत व कुर्बानी रायगा चली जाती, इस्लाम में सब ही शहादते और कुर्बानियां को आज हम सिर्फ इमाम हुसैन (अ.स.) की दी गयी कुरबानियों की वजह से याद कर पाते है।
एस.एन.लाल
जिस ‘बुजु़र्गवाने दीन’ शहीद की शहादत जिस दिन हो, हम उसको उसी दिन मनाये, हम सारी शाहदते मोहर्रम में ही क्यों मनाने खड़े हो जाते है। इससे तो यही लगता है…कि हमको अपने बुजु़र्गवाने दीन’ की शाहदत या वफात की तारीख़ ही नहीं मालूम… या माज़ अल्लाह इमाम हुसैन (अ.स.) की कुर्बानी को कम करने की कोशिश की जा रही है…या करबला का इतिहास ही नहीं जानते…! बस इस्लाम में जो मौलाना जितनी तारीख़ जानता है..बस उतनी ही बयान करता है..! डा0 ताहिर कादरी साहब और मौलाना तारीख़ जमील जैसे मुताअला करने वाले बहुत ही कम उलेमा हैै…! या ये मौलाना जानते हुए भी….ये…!
एस.एन.लाल
मै समझता हूॅं करबला की इतिहास बताने से सही इस्लाम लोगो तक पहुंचेगा, क्योंकि करबला में एक ही दिन सारे रिश्तों की अहमियत और दर्जे को बताया गया है, नमाज़ और क़ुरआन की अहमियत को बताया गया है। दोस्त, दुश्मन और यतीमों के साथ सुलूक को बताया गया है, भूखे-प्यासे रहकर कैसे अल्लाह के दीन पर मुसतहकम रहते है…, ये बताया गया है। सिर्फ करबला अगर बयान कर दी जाये…, तो उसमें सबकुछ यानि पूरा इस्लाम सिमट आता है…!
तभी ये इक़बाल के नाम से मंसूब शेर है।
इस्लाम के दामन में बस इसके सिवा क्या है..
एक ज़रबे यदुल्लाह है, एक सजद-ए-शब्बीरी, ।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here