मैं पत्रकार हूं ?

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जी हां मैं पत्रकार हूं शायद यह वाक्य हिंदुस्तान में बहुत से लोगों के लिए बेशर्मी के साथ गर्व का विषय बन चुका है। और इसी बेशर्मी की चाशनी में डूबे हुए गर्व ने अपने देश की पत्रकारिता और मीडिया को भंवर में फंसा दिया है।
मैं पत्रकार हूं मैं जब जिससे चाहे सवाल कर सकता हूं! मैं जब जिससे चाहे बहस कर सकता हूं! मैं जब जिस पर जहां चाहूं इलजाम लगा सकता हूं! मैं जब जिसको चाहूं जहां चाहूं कटघरे में खड़ा कर सकता हूं।क्योंकि मैं पत्रकार हूं।
जी हां मैं पत्रकार हूं! मुझे लिखना नहीं आता तो क्या हुआ। मुझे किसी विषय पर गहन ज्ञान नहीं है तो क्या हुआ लेकिन मेरी आवाज बहुत तेज है मैं अच्छी तरह से चीख सकता हूं। मैं अच्छी तरह से हाथ चला सकता हूं। मैं अच्छी तरह से डेस्क पर हाथ मार सकता हूं। मैं अच्छी तरह से खड़ा होकर कूद सकता हूं। मैं बहुत अच्छी तरह से एक्टिंग कर सकता हूं। मैं पत्रकार हूं!
जी हां मैं पत्रकार हूं। मुझे तिल का ताड़ बनाना अच्छी तरह आता है। मुझे नमक मिर्च लगाकर मसाला खबरें बनाकर परोसने में महारत हासिल है। मैं अपनी आत्मा को बेच चुका हूं। मैंने सच और झूठ के बीच में अंतर करना छोड़ दिया है। मेरे अंदर गलत लोगों का साथ देने की परिपक्वता आ गई है। मैं पत्रकार हूं!
जी हां मैं पत्रकार हूं। मैं कई पत्रकार संगठनों का सदस्य एवं पदाधिकारी हूं। मैं रोज प्रेस क्लब में काफी समय व्यतीत करता हूं। मैं सरकार की चापलूसी करता हूं। मैं चार पहिया वाहन से घूमता हूं। मैं सरकार के हर गलत काम को सही साबित करता हूं। मैं पत्रकार हूं!
जी हां मैं पत्रकार हूं! मुझे लिखना नहीं आता तो क्या हुआ! मैं किसी विषय पर बहस नहीं कर सकता तो क्या हुआ! मैं किसी विषय पर लिख नहीं सकता तो क्या हुआ! मेरे शब्दों का उच्चारण साफ नहीं है तो क्या हुआ! मैं टीआरपी का भूखा हूं तो क्या हुआ! मैं पत्रकार हूं!

जी हां यह तारीफ है उन तथाकथित पत्रकारों के लिए हैं जिन्होंने पत्रकारिता और ईमानदार मेहनतकश पढ़े-लिखे पत्रकारों को बदनाम कर के रख दिया है उनके लिए जीना दूभर कर दिया है।
2014 से मीडिया की शक्ल बिल्कुल बदल चुकी है न्यूज़ एंकर बेलगाम हो चुके हैं उनकी जबान पर जो आता है वह न्यूज़ रूम में बैठकर बोल देते हैं उनकी जमीर आत्मा सब बिक चुकी है उन्हें अच्छे और बुरे की कोई तमीज नहीं रह गई उनके पास सच और गलत का ज्ञान खत्म हो चुका है। और ताल ठोक के कहते हैं कि मैं पत्रकार हूं।ऐसे न्यूज़ एंकर्स की फेहरिस्त लंबी है जो चापलूसी की चाशनी में डूब कर अपना वजूद खोने की कगार पर हैं। सुधीर चौधरी, अर्णब गोस्वामी, दिलीप चौरसिया, अमीश देवगन ये ऐसे न्यूज़ एंकर्स हैं जो देश में धार्मिक भावनाएं भड़का कर अमन और शांति को भंग करने का प्रयास करते रहते हैं इसके अलावा हिंदुस्तान की गंगा जमुनी तहजीब को भी खत्म करने का प्रयास करते रहते हैं। साथ ही साथ ये लोग पत्रकारिता को पूरी तरह बदनाम करने पर तुले हुए हैं।
खींचो न कमानो को न तलवार निकालो ।
जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो।।
आजकल के तथाकथित पत्रकारों ने इस शेर का मतलब ही उल्टा कर दिया। हर वक्त कमानो को खींचे रहते हैं और तलवार निकाले रहते हैं जबकि उनके मुकाबले पर कोई नहीं है वह अपने देश की अपनी ही जनता को निशाना बनाए हुए हैं।
शायद इस तरह के पत्रकार यही संदेश देना चाहते हैं कि
“खींचूंगा कमानों को मैं तलवार निकालूंगा।
“झूठों का साथ देने को अखबार निकालूंगा।।

जयहिंद।

सैय्यद एम अली तक़वी
लखनऊ
syedtaqvi12@gmail.com

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