भारत में अच्छे दिन की तस्वीर।

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    अच्छे दिन आयेंगे! यही वह मंत्र था जिसे हिंदुस्तान के जहांपनाह ने अपने भाइयों और बहनों को दिया था। और ऐसे ज़ोरदार तरीके से दिया था कि आज तक प्रत्येक व्यक्ति इस मंत्र का उच्चारण कर रहा है। मंत्र की अपनी एक विशेषता होती है यदि ग़लत उच्चारण कर दिया जाये तो असर उल्टा या दूसरा हो जाता है। यहां भी यही हुआ।
    जनता अपने अच्छे दिन समझने लगी जबकि यह सेवक के खुद के लिए था।
    अच्छे दिन की शुरुआत नोटबंदी से शुरू होकर घरबंदी तक पहुंच गई। इस बीच विदेशों से कालाधन लाकर पंद्रह लाख खातों में डालने के वादों से जनता मंत्र मुग्ध हो गई वह भूल गई कि जहां टैक्स अदा की गई राशि पर भी टैक्स लिया जाता है और जहां बगैर रिश्वत के कोई काम नहीं होता वहां मुफ़्त में पंद्रह लाख क्यूं और कैसे मिलेगा! जनता से मांगने वाला समय, समय-समय पर बदलता रहा। कभी पचास दिन, कभी एक साल, कभी पांच साल । काम ना करने की स्थिति में कभी चौराहा, कभी सज़ा, कभी कुछ! समय बदलता रहा और स्थिति यहां तक आ पहुंची कि भाइयों और बहनों से ही कागजात मांगे जाने लगे।
    इसी बीच सेर पर सवा सेर कोरोनावायरस ने दस्तक दी। महोदय ने समझा जैसे दुनिया में सब नेताओं को गले लगा लगा के टोपी पहनाई इसे भी पहना दूंगा मगर मामला उल्टा पड़ गया वह इन्हीं के गले पड़ गया। अब लेने के देने पड़ गये। ताली और थाली बजवाई कि शायद डर कर भाग जाये, मोमबत्ती और दिया जलवाया कि शायद रौशनी से भाग जाये मगर बेकार। उल्टा जहांपनाह कोपचे में चले गए। वैसे भी राजा और मंत्री महलों में रहकर रामायण और महाभारत देखते हैं भले ही सीखते कुछ नहीं।
    खैर आइये भारत के शहरों, अस्पतालों और सड़कों पर चलते हैं और देखते हैं कि अच्छे दिन की तस्वीरें कैसी हैं!
    शहर के शहर बंद हैं। दुकान, आफिस, स्कूल, कोचिंग सब अपनी किस्मत को रो रहे हैं। अस्पतालों का नामकरण हो गया अब कोविड अस्पताल हो गये। जहां सामान्य रोगी की नहीं बल्कि सिर्फ करोना की जांच होगी। ऐसा लगता है कि मरीज़ या तो गायब हो गए या मर्ज सब खत्म हो गये या फिर अस्पताल जबरदस्ती मरीज़ बना देता था। खैर कोरोना के इलाज में लगे डाक्टर, नर्स सब अपनी जिंदगी दांव पर लगा कर सेवा कर रहे हैं। ये बात अलग है कि सुविधा के अभाव में प्रदर्शन भी कर रहे हैं।
    सड़कों की हालत देखिए लाकडाउन के बावजूद जनता सड़कों पर अपने घरों को पैदल जाने के लिए मजबूर हैं। सुविधा के नाम पर डंडे खा खाकर घर जा रही है जनता।
    कोविड केयर के नाम पर हर जगह से धन‌ जमा करने के बावजूद रोज जनता से भीख मांगी जा रही है। ऐसा लग रहा है कि देश को सरकार नहीं जनता चला रही है। पचास दिन हो गए यही नहीं पता कि क्या किया जाए। बड़े सरकार को यह पता है कि जनता सड़कों पर आ रही है क्योंकि वह घर जाना चाहती है मगर यह नहीं पता कि उसे पैसे की भी जरूरत है। रोजगार ठप्प हैं मगर साहब कह रहे हैं कि जंग हम जीतेंगे।
    जंग आप और आपकी सरकार जीत गई। बधाई।
    देश की जनता जंग हार गई। अफसोस
    आपने धन इकट्ठा कर लिया। बधाई।
    जनता ने रोजगार खो दिया। अफसोस
    कोई बात नहीं जनता का सेमीफाइनल 2022 और फाइनल 2024 में। शाट देखना।
    जयहिंद

    सैय्यद एम अली तक़वी
    syedtaqvi12@gmail.com

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