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पहला चुप ताज़िया 26 अक्टूबर 1857 ईo मैं उठा

लेखक एस, एन, लाल

नवाब वाजिद अली के काल में नवाबज़ादा आग़ा अहमद अली खांॅ के ताज़िये का जुलूस शाही अन्दाज़ में चेहलुम के दिन निकलता था जोकि मेंहदीगंज की कर्बला को जाता था। अवध में अज़ादारी लगभग 100 साल पूरे कर अपनी मन्जिले मक़सूद पर थी। ऐसी आरास्ता अज़ादारी पूरी दुनिया में कहीं न थी और साथ-साथ इस अज़ादारी ने लखनऊ को नई तहज़ीब भी दी, जिस पर लोग आजतक रश्क़ (घमण्ड) करते हैं इसीलिए अज़ादारी में जो कुछ अवध में हुआ, उसे पुरी दुनिया ने अपनाया। अवध यानि मुख्य रूप से लखनऊ में भी सन् 1857 ई. से पहले अज़ादारी कुछ नवाबीन के दौर में 12 दिन की होती थी तो कुछ के दौर में 50 दिन की होती थी। ये 68 दिन की अज़ादारी होने के पीछे अॅंगे्रज़ों से भारत देश को आज़ाद कराने की कहानी है। एस.एन.लाल
सन् 1856 ई. में गदर की नींव पड़ चुकी थी। 30 अप्रैल 1856 ई. को क्रान्तिकारियों ने उर्दू में एक फरमान जारी किया जोकि हिन्दू-मुस्लिम दोनों के लिए था जिसमें लिखा था ‘‘फिरंगियों का क़त्ल करो’’। क्रान्तिकारियों ने अॅंग्रेज़ों को मारना शुरू कर दिया था। दिसम्बर महीने में अहमद अली खांॅ नामक एक आदमी अॅंग्रेज़ जर्नल हेवलेक (नाम का सही नहीं पता चलता, लेकिन उस समय यही जनरल था) को मारने गया। सामने जनरल की पत्नी के आ जाने से वह गोली उसकी पत्नी को लगी और वह मर गयी और अहमद अली खांॅ वहांॅ से भाग गये। (एस.एन.लाल) जनरल बहुत बौखला गया और अहमद अली खांॅ को खोजने लगा। हेवलेक अहमद अली खांॅ को पहचानता न था सिर्फ नाम सुन रखा था। उसको किसी ने लखनऊ के माली खांॅ सराय में रहने वाले नवाबज़ादा आग़ा अहमद अली खांॅ को बता दिया। फिर क्या था जनरल हाथ में बन्दूक़ लिये उनकी हवेली पहुॅंचा और सीधे उनकी बैठक में पहुॅंच गया। जनरल नवाब को गोली मारना ही चाहता था तभी वहांॅ बैठे आग़ा जाफर ने अंॅग्रेज़ को धक्का देकर नवाब की जान बचाई, लेकिन जनरल नवाब को ज़बरदस्ती गिरफ्तार करके साथ ले गया। नवाब पर मुकदमा चला और जनरल से सारे झूठे सबूत सही साबित कर दिये, जिससे नवाब मुकदमा हार गये और उनको फांॅसी की सज़ा हो गयी। इसी दौरान मोहर्रम का महीना आ गया था। नवाब अहमद अली खांॅ के घर में पहले से ही मातम छाया हुआ था। इस ख़बर के बाद नवाब के घर में कोहराम मच गया। जब फांॅसी की ख़बर वास्तविक हमलावर अहमद अली खांॅ को पता चली जोकि कानपुर में रहता था, उसे ये बात गंवारा नहीं हुई कि उसके किये की सज़ा पर कोई और फांॅसी पर चढ़े। अहमद अली खांॅ ने लखनऊ की अदालत में हाज़िर होकर अपना गुनाह कबूल कर लिया। एस.एन.लाल
नवाब साहब 21 सितम्बर 1857 ई. को रिहा हुए। नवाब अहमद अली खांॅ चेहलुम में अपना खानदानी ताज़िया बिल्कुल शाही जुलूस की शक्ल में निकालते थे। उस दौर में ये माली खांॅ सराय से निकल कर मेंहदीगंज की कर्बला जाता था जोकि मोहर्रम का आखिरी जुलूस हुआ करता था। ये इनके पूर्वज अमीरज़ादा मिर्ज़ा अली खांॅ इफ्तेखारुद्दौला दिलावर जंग निकालते थे। इनकी चौथी पुश्त में से नवाबज़ादा आग़ा अहमद अली खांॅ को अपनी बेगुनाही साबित करने और रिहा होने में लगभग 10 महीनों से ऊपर लग गया और काफी पैसा भी खर्च हुआ। (एस.एन.लाल) यही नहीं नवाब के न रहने पर उनकी हवेली से काफी क़ीमती सामान चोरी भी चला गया। चेहलुम करीब था, उसी शान से जुलूस उठाने के लिए पैसे का इन्तेज़ाम नहीं हो पा रहा था, तो उनके मुसाहिबगीरों में थे हकीम बड़े साहब, उन्होंने मशविरा दिया आप अपना ताज़िया 17 दिन बाद यानि आठ रीबअव्वल ग्यारहवें इमाम हसन अस्करी(अ.स.) की शहादत वाले दिन उठायें, तबतक इन्तेज़ाम हो जायेगा। एस.एन.लाल
फिर ये ऐलान हो गया कि ताज़िया 26 अक्टूबर को उठेगा, लेकिन फिर भी पैसांे का इन्तेज़ाम नहीं हो पाया। अब नवाब बड़ी उलझन में थे क्योंकि नौ रबीअव्वल को ईद-ए-ज़हरा, 12 रबीअव्वल से 17 रबीअव्वल तक मिलादुन नबी है इसलिए आठ रबीअव्वल के बाद जुलूस निकालना ठीक न होगा। नवाब ने अपने मुसाहिबों, दोस्तों और अलेमा से रायमशविरा करके जुलूस 26 अक्टूबर को ही निकाला गया। (एस.एन.लाल) ये जुलूस आठ रबीअव्वल की सुबह की नमाज़ के बाद निकला तो यह काज़मैन को गया जहांॅ सातवें इमाम मूसिये काज़िम (अ.स.) का रौज़ा है। इस जुलूस में अलम, ताज़िये, ताबूत, अम्मारी और मातम करते लोग तो थे लेकिन ढोल-ताशे और माहे मरातिब नहीं था। जुलूस खामोशी के साथ निकला तो 26 अक्टूबर 1857 ई. से इस जुलूस का नाम चुप ताज़िये का जुलूस पड़ गया और धीरे-धीरे ये भी अवध की अज़ादारी की धरोहर बन गया। फिर हिन्दुस्तान क्या कई देशों में अज़ादारी 68 दिन की होने लगी।
एस.एन.लाल
माफी चाहता हूॅं, लोग लेख चोरी कर के अपना नाम डाल लेते है। इस लिए लेख में बीच-बीच में नाम डाला है।

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