ना मस्जिद चाहिए,ना मंदिर हमको दो वक़्त की रोटी चाहिए

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    (यकजहती टाइम्स समाचार) एस.एन.लाल
    हमारे यहां एक नौकरानी काम करती है, जोकि नाम से मुस्लिम है, उसका पहला पति मुस्लिम था उससे 3 बच्चे हुए। 16 साल पहले उसके पति ने या उसने अपने पति को छोड़ दिया, फिर एक हिन्दू धर्म के व्यक्ति से शादी कर ली और उसके उससे भी 2 बच्चे है, सब साथ रहते है। जहां उस घर में ईद-बक़रीद मनाई जाती है, तो वही होली-दिवाली भी। यही एक हिन्दुस्तान की सच्ची तस्वीर है। ऐसी तस्वीर घर में दो धर्मों के एक ही परिवार वालों के साथ रहने से ही नहीं। पड़ोसियों व गांव वालों के साथ मेल-महोब्बत के कारण, आज ग़रीब और महोब्बती जाहिल लोगों के घरों में ही नज़र आती है। पढ़े लिखे इन नज़ारों से दूर हो चुके हैं। ऐसे लोगो को केवल दो वक़्त की रोटी चाहिए न मन्दिर और न मस्जिद…! एस.एन.लाल
    ग़रीब और महोब्बती जाहिलों को चॉंद-सितारे छूने दो।
    चार किताबे पढ़कर कल ये हम जैसे हो जायेंगे।।
    इनको इस मन्दिर-मस्जिद मुकदमें के बारे में कुछ नहीं पता, उनसे पूछा तो उनको बस दो वक़्त की रोटी चाहिए। क्योंकि हिन्दू शस्त्रों में काम को पूजा कहा गया है और मुस्लिम में रोज़गार से वाजिब नमाज़ों के लिए वक़्त निकालने को कहा गया है, बाक़ी किसी प्रकार नमाज़ या इबादत को हलाल रोज़गार के समय पर छोड़ सकते है यानि रोज़गार ही इबादत है। एस.एन.लाल
    देश की लगभग 90 प्रतिशत जनता को मन्दिर या मस्जिद मुद्दे से कुछ भी लेना-देना नहीं, सब शान्ति और अमन के पक्षधर हैं। इस मन्दी, बे-रोज़गारी और मंहगाई के समय कोई भी फैसला आये, न कोई खुशी मनाने की कोशिश करेगा और न ही ग़म मनाने का हौसला ही रखता है। अगर डर है तो उन 10 प्रतिशत उन पढ़े लिखें लोगों से जो राजनीति से जुड़े हैं। वरना फैसले की खुशी में जनता को न तो कोई लाभ मिलना है और न ही हानि होना है। सब अपने निकट के मन्दिरों व मस्जिदों में पूजा व इबादत कर रहें है और करते रहेंगे। एस.एन.लाल
    मज़हब व धर्म जो सिखाता है मोहब्बत-भाईचारा। डर है, पढ़े-लिखे जाहिलों में भाषा के ज्ञान की कमी के कारण,…जो नाम मात्र को पढ़े हुए है। जो कुछ का कुछ समझते है और जनता को कुछ का कुछ समझाते हैं।
    वह भाषा की अज्ञानता के कारण ः जैसे
    लब पे आती है दुआ बन कर तमन्ना मेरी।
    जिन्दगी शम्मा की सूरत हो खुदाया मेरी।।
    हिन्द अनुवाद…!
    होंठो पर आती है प्रार्थना बन कर ईच्छा मेरी।
    जिन्दगी मोमबत्ती की तरह प्रकाशित रहे मेरी।। एस.एन.लाल
    आज जो शान्ति मिटिंग हो रही है उसमें एक-दूसरे को अपने बारे और अपने मज़हब की अच्छायों को शब्दों के मानों के साथ बताने की ज़रुरत है, ताकि उन को बहकाया न जा सके। वैसे तो सरकार और मुद््दो को हल करने के लिए जैसे नेताओं को नज़रबन्द कर सकती है। वैसे ही जिन नताओं के कानून की निगाह में रिकार्ड ठीक न हो, उनके लिए भी वही कद्म उठाये जायें। हमको शान्ति बनाये रखने के लिए ऐसे नेताओं हरकतों पर निगाह रखने की ज़रुरत है, वह चाहे राजनेता हो या राजनीति से जुड़े धर्मगुरु। क्योंकि किसी भी धर्म का सच्चा धर्मगुरु शान्ति भंग करने के पक्ष में हो ही नहीं सकता। जनता तो शान्ति बनाये ही रहेगी। बस उसको समय पर रोटी मिलती रहे। एस.एन.लाल
    ”ज़फ़र” आदमी उसको न जानियेगा, हो वह कैसा ही साहबे, फ़हमो-ज़का…..
    जिसे ऐश में यादे-ख़ुदा न रही, जिसे तैश में ख़ौफ़े खुदा न रहा…..

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