चीन-भारत तनाव के मायने? पवन श्रीवास्तव

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    चीन और भारत में युद्व होगा या नहीं इसको लेकर आये दिन कयास लगाये जाते हैं, परन्तु यदि गहराई से बात की जाए तो चीन वैज्ञानिक समृद्धि तथा सामरिक मामलों में आज भी रूस के सामने दो कौड़ी की हैसियत रखता है। रूस वैज्ञानिक व सामरिक रूप से बहुत मजबूत होते हुए भी आम लोगों का जीवन बेहतर नहीं बना पाया।
    सबको समान अवसर उपलब्ध नहीं करा पाया। साम्यवाद कागज में ही रह गया वह बात अलग है कि चीन जैसे धूर्त देश की तुलना में कुछ बेहतर साम्यवाद था।
    जिन.जिन देशों में साम्यवाद था फिर समय के साथ साम्यवाद हटा। वहां दृश्य या अदृश्य तानाशाही की स्थापना हुई। कारण एक ही था कि साम्यवाद के नाम पर जो ग्रुप सत्ता चला रहे थेए कम्युनिस्ट पार्टी के नाम पर जो पदाधिकारी लोग कुंडली मारे हुए आर्थिक नियंत्रण कर रहे थेए उनका कामकाज वैसे ही चलता रहाए उन लोगों ने बदले हुए रूप में अपनी कंपनियां बना लीं। रूस हो या कोई दूसरा साम्यवादी देशए सभी का यही हाल रहा।
    साम्यवादी देशों में आर्थिक सत्ता हो या राजनैतिक सत्ता आम लोगों के पास बिना शर्त व स्वतंत्रता व सम्मान के साथ कभी पहुंची ही नहीं। उल्टे आम लोगों को साम्यवाद के नाम परए खूबसूरत भविष्य के नाम पर जमकर चूतिया बनाया गया। विभिन्न प्रकार के साहित्य के माध्यम से लोगों के भीतर साम्यवाद के प्रति रोमांस पैदा किया गया। ऐसे लेखकों को जमकर प्रमोट किया गया। आम लोगों के साथ धोखा होता रहाए दुनिया साम्यवाद के रोमांस के साथ जीती रही। एक दिन लोगों ने कहा कि साम्यवाद देख लिया अब लोकतंत्र देखेंगे। जैसे साम्यवाद कागज पर थाए वैसे ही लोकतंत्र भी कागज पर ही आया। कारणए ऊपर जमे लोग वही थे या उसी तीन तिकड़म के थे। इसलिए लोकतंत्र के नाम पर ज कुछ आया वह दृश्य अदृश्य तानाशाही के रूप में आया। न तथाकथित साम्यवाद रहाए न लोकतंत्र ही आ पाया। अजीब सा विसंगतियों भरा काकटेल बन गया।
    सोवियत संघ चीन की तरह अतिवाद की तरह का हिंसकए बर्बर व धूर्त नहीं था। यही कारण रहा कि लोगों के दबाव में आकर साम्यवादी मुलम्मा उतार फेंकना पड़ा। रूस का उतरा तो जिन देशों को रूस का सहयोग थाए उन देशों में भी मुलम्मा उतर गया। आयातित मामला आखिर कब तक चलता रहता।
    चीन की सत्ता अपने लोगों के लिए बहुत ही अधिक धूर्त व बर्बर हैए साम्यवाद के ककहरे की समझ नहीं है। इसलिए लोगों को पीढ़ी दर पीढ़ी इतना डरा दिया गया है कि जैसे भारत में दलितों ने नियति मान ली थी और हजारों सालों तक शान में कसीदे पढ़ते रहे। वैसे ही चीन में स्थिति हैए शान में कसीदे पढ़े जाते हैं। जो दृष्टि वाले लोग हैंए वे कहां गायब हो जाते हैंए पता ही नहीं चलताए उनकी अगली पीढ़ियों को नहीं पता चलता कि वे लोग बिना पूर्वजों के अचानक आसमान से टपक कर या धरती फाड़ कर पैदा कैसे हो गए। बहुत लोगों के दिलोदिमाग में यह भर गया है कि चीन आर्थिक रूप से बहुत मजबूत देश हैए इतना मजबूत कि अमेरिका के बाद दुनिया की नंबर दो का मजबूत देश है। बहुत लोग चीन को सैन्य रूप से भी बहुत मजबूत देश मानते हैंए इतना मजबूत कि अमेरिका भी कांपता है।
    इन मिथकों व गलतफहियों का आधार ळक्च् के आकड़े रहते हैं। चीन के कागजी साम्यवाद के प्रति छुपा हुआ रोमांस रहता है। अमेरिका की इकोनोमी लगभग साढ़े 21 ट्रिलियनए चीन की इकोनोमी लगभग सवा 14 ट्रिलियन। अमेरिका की ळक्च् का अधिकतर भाग उसकी अपनी ळक्च् है। चीन की ळक्च् का बहुत बड़ा हिस्सा कागजी लिखापढ़ी में चीन के खाते में भले ही चढ़ती है लेकिन चीन की ळक्च् है नहीं।
    कारण यह है कि एक तरफ चीन साम्यवाद के नाम कारपोरेट का विरोध करता हैए लेकिन असलियत में चीन की सत्ता ने चीन को दुनिया की बड़ी कंपनियों का कारखाना बना दिया है। जिनके विरोध पर साम्यवाद होता हैए उन्हीं को पूरा देश गिरवी रख दिया है। लिखापढ़ी में ळक्च् भले ही चीन के खाते में चढ़ती होए लेकिन चीन की ळक्च् का बहुत बड़ा हिस्सा चीन में दुनिया भर की जिन कंपनियों ने अपने कारखाने लगा रखे हैंए उन कंपनियों का हैए ये कंपनियां चीनी कंपनियां नहीं हैं। पहली बात यह हुई कि चीन की असल ळक्च् सवा 14 ट्रिलियन नहीं है। दूसरी बात यह कि चीन अपनी ळक्च् का बड़ा हिस्सा अपने देश के लोगों का जीवन स्तर बेहतर करने की बजायए साम्राज्यवाद पर खर्च करता हैए फूं.फां पर खर्च करता है। यही कारण है चीन को अपनी जनसंख्या के अच्छे खासे प्रतिशत को बर्बरता के साथ कुचलते रहने की रणनीति बनाए रखना पड़ता है। कोई भी देश जो अपने आम लोगों की परवाह नहीं करताए वह कभी भी लंबे समय तक वास्तविक युद्ध नहीं लड़ सकता। क्योंकि युद्ध खोखलाहट से नहीं लड़े व जीते जाते हैं।
    यही कारण है कि भारत बनाम चीन हो या भारत बनाम पाकिस्तान हो। वास्तव में लंबे युद्ध नहीं लड़ सकते हैं। हंगामा कर सकते हैंए दबाव डालने के लिए रणनीति के तहत धींगामुस्ती कर सकते हैं। कुछ दिनों के लिए युद्ध लड़ने की नौटंकी भी कर सकते हैंए लकिन वास्तव में लंबे समय के लिए गंभीर युद्ध नहीं लड़ेंगे। दूर.दूर तक कोई संभावना नहीं। क्योंकि ये तीनों ही देशए अपने.अपने देशों के आम लोगों के प्रति ईमानदार नहीं हैं। ये तीनों ही देश नौकरशाही द्वारा संचालित होते हैं।
    यदि ढंग से युद्ध हो तो भारत व चीन कुछ दिनों में ही हांफने लगेंगे। सामरिक दृष्टि से चीन का पलड़ा भारी रहेगा लेकिन बहुत भारी नुकसान दोनों देशों को होगा। उबरने में दशकों लग जाएंगे। यह बात दोनों देशों की सरकारें जानती हैं। इसलिए सत्ताएं क्यों पटरी पर दौड़ रही सत्ता को खतरा पहुंचाएंगी। इसलिए युद्ध नहीं होना। युद्ध विशेषज्ञों को अपनी विशेषज्ञता की दुकान चलाने दीजिएए वास्तविक युद्ध नहीं होगाए चीन जो कर रहा है वह रणनीति के तहत कर रहा है।
    भारत अमेरिका के पाले में अनेक वर्षों से है। पाकिस्तान गया ही चीन के पाले में इसलिए है क्योंकि कि भारत अमेरिका के पाले में खड़ा हो गया था। भारत बड़ा देश हैए बड़ा बाजार हैए इसलिए अमेरिका की प्राथमिकता भारत रहेगा न कि पाकिस्तान। वैसे भी पाकिस्तान रहेगा तो अमेरिका के शिकंजे मेंम अमेरिका अपने पालतू को ऐसे थोड़ी ना खुला छोड़ देगा। रही बात चीन के मजबूत होने की तो न तो चीन की इकोनोमी मजबूत हैए न ही सैन्य शक्तिए न ही वैज्ञानिक गंभीर अनुसंधान। अमेरिका की इकोनोमी चीन की इकोनोमी की तुलना में बहुत अधिक मजबूत है। अमेरिका के लोगों का जीवन स्तर चीन के लोगों की तुलना में सैकड़ों गुना बेहतर है।
    चीन की जनसंख्या लगभग डेढ़ अरब हैए इकोनोमी है कागज पर लिखापढ़ी में लगभग सवा 14 ट्रिलियनए जिसमें बहुत बड़ा हिस्सा अमेरिका व योरप की कंपनियों का है ;जो कागजी लिखापढ़ी पर भले ही चीन की ळक्च् मानी जाती होए लेकिन ळक्च् चीन की न होकर अमेरिका व योरप की हुईए भले ही अमेरिका व योरप के ळक्च् बहीखाते में न चढ़ती होद्ध।
    अमेरिका की जनसंख्या लगभग तैंतीस करोड़ हैए इकोनोमी है लगभग साढ़े इक्कीस ट्रिलियन। इस लगभग साढ़े इक्कीस ट्रिलियन में अधिकतर ळक्च् अमेरिका की ही हैए चीन की तरह कागजी लिखापढ़ी वाली नहीं है। चीन की गणना.पद्धतियों में अंतर व गणनाओं में वैसे ही झोल होते हैं जैसे कई देशों द्वारा कोरोना संक्रमित लोगों व मृ्त्यु दर में झोल किए जा रहे हैं।
    यदि वर्तमान भारत सरकार ने काश्मीर मसले परए नेपाल मसले पर गंभीर राजनयिक गलतियां न की होतीं तो चीन का साहस नहीं बढ़ पाता। खैर जो हो गया वह हो गया जो बोया गया है फसल तो काटनी ही पड़ेगी भुगतना पड़ेगा। लेकिन जो भी लेना.देना हो वह सब कर.कुरा कर चीन के साथ सुलह.समझौता कर लेना चाहिए। असल देशभक्ति युद्ध लड़ना या किसी जाति धर्म के लोगों से नफरत करना नहीं। बल्कि अपने देश व समाज के लोगों के हित के लिए काम करना होता है।
    भारत को जरूरत है सस्टेनेबल व आत्मनिर्भर विकास की। सस्टेनेबिलिटी व आत्मनिर्भरता का चीनी सामानों को खरीदनेए न खरीदने से खास मतलब नहीं। सस्टेनेबिलिटी व आत्मनिर्भरता बहुत गंभीरए सूक्ष्म व दूरदृष्टि वाले मसले हैं। इस पर विचार करने की आवश्यकता है और अपनी आत्मनिर्भरता तथा विकास को लेकर दूरदृष्टि अपनाने की जरूरत पर बल दिया जाना चाहिए जिससे एशिया महाद्विप में भारत विश्वगुरू के रूप में अपनी पहचान को सशक्त रूप से प्रदर्शित कर सके।

    पवन श्रीवास्तव
    (लेखक: वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं)

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