क्यों ख़त्म हो रही है इंसानियत ?

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    मैं भी इंसान तुम भी इंसान फिर मसला क्या है? मसला है शायद जिहालत का मसला, ताकत का मसला जो इंसान को इंसान का दुश्मन बनाये दे रहा है। इस वक्त जिस तरह का माहौल बन रहा है वह देश के लिए घातक है। इंसानियत का प्रतिशत गिरता जा रहा है हैवानियत बढ़ती जा रही है। मगर कुछ लोग हैं जो इंसानियत का परचम बुलंद किए हैं इसीलिए हिंदुस्तान जिंदा है वरना हैवानों ने कोई कसर नहीं छोड़ी है।
    इंसान की नीयत का ही नाम है इंसानियत। और जो इंसान अपनी आन, बानऔर शान के साथ जीता है वह है इंसान और उसकी जो दूसरो के प्रति कुछ भी बुरा या गलत ना करने की आन है वहीं है इंसानियत। जिसके अंदर दूसरे के प्रति बुरा करने की भावना होती है वह है हैवानियत।
    प्रत्येक मानव के भीतर इंसान और शैतान दोनों मौजूद होता है। विश्व में सभी धर्मों का मकसद मानव के शैतान को नष्टकर उसके इंसान को जागृत करना है लेकिन अफसोस यह है धर्म के नाम पर उसके मूल स्वरूप इंसानियत को भूल जाते हैं। नतीजा अपने धर्म, मजहब धारणाओं और सोच के प्रति कट्टर होकर अन्य धर्मों पर वार करने लगते हैं। इंसानियत को भूलकर अपने धर्म की सेवा का श्रेय लेने वाला वास्तव में अपने धर्म की सेवा नहीं कर रहा है बल्कि अपने धर्म के मूल उद्देश्य से भटककर अधर्म, असामाजिक कार्य कर रहा होता है। उसको धार्मिक या मजहबी व्यक्ति कहना भी सही नहीं होगा क्योंकि सभी धर्मों का सार है ‘इंसानियत’। दूसरे अर्थों में सभी धर्मों का मूल उद्देश्य है मानव को अपने समाज में, दुनिया में शांतिपूर्ण जीवन जीने का वातावरण प्रदान करना। सभी धर्म मानव कल्याण के लिए है। किसी भी धर्म का पालन करने का मतलब है अपने व्यवहार को समाज के अनुकूल बनाना अर्थात इंसानियत के गुणों का विकास करना। यदि कोई व्यक्ति मन्दिर में घंटे बजाकर, पूजा, आरती करके या मस्जिद में नमाज अदा कर, अपने व्यवहार में शालीनता, ईमानदारी, सच्चाई उत्पन्न नहीं कर पाया तो वह अपने धार्मिक मकसद को ही खो देता है। धर्म के नाम पर हिंसा करने वाला अपने धर्म के साथ धोखा तो करता ही है, इंसानियत का भी दुश्मन है। यदि कोई व्यक्ति बिना किसी धर्म को अपनाये सिर्फ ‘इंसानियत’ का पालन करता है तो वह उस धर्म पालक से अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति है जो धर्म का पालन तो करता है परन्तु इंसानियत के दायरे में नही रहता है, हिंसा, धोखाधड़ी, बेईमानी जैसे काम को अंजाम देता है। उसका धार्मिक होना सिर्फ दिखावा है अपने आपको धोखा देना है।
    ‘इंसानियत’ सभी धर्मों को एक सूत्र मे पिरोने वाला धर्म है। क्योंकि सभी धर्मों का अर्थ भी इंसानियत ही है। वर्तमान में बढ़ रहे अत्याचार का कारण भी धर्म ग्रन्थों के तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करना है।
    फैसला हमें और आपको करना है कि इस वक्त सरकार किस दिशा में काम कर रही है और हम लोग सही कर रहे हैं या ग़लत ?

    सैय्यद एम अली तक़वी
    ब्यूरो चीफ- दि रिवोल्यूशन न्यूज
    निदेशक- यूरिट एजुकेशन इंस्टीट्यूट

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