क्या इमाम अहमद रज़ा ने वाक़ई ताज़ियादारी को हराम कहा है?

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    1.               जवाब सैयद फिरोज अहमद

    इमाम अहमद राजा फ़ाज़िल बरेलवी ने मुरवाजा ताज़िया दरी को हराम कहा है. ताज़िए दरी को हराम नहीं कहामुफ्ती आज़म हिन्द जो इमाम अहमद राजा क साहबज़ादे हैं वो खुद जब तो खुद ताज़िए शरीफ की ज़ियारत ज़रूर करते। आलिम की एक ज़िम्मेदारी होती है अवाम कहीं उलटी सीढ़ी रस्म न करने लगें। ताज़िये को लेकर भी इसी वजह से ऐसे फतवे दिए गए। मुरवाजा ताज़ियादारी मतलब ढोल ताशे वग़ैरह के साथ ताज़िया निकालना गलिओं में घुमाना उसको हराम कहा गया है.उनकस कहना है की ये असल ताज़िया नहीं बल्कि लकड़ी और कागज़ का बना है अगर ताज़िया बना है तो असल शक्ल में जैसे इमाम हुसैन का रोज़ा मुबारक है वैसा बनाओ तो जायज़ है। जब इमाम अहमद रज़ा ने यह फतवा लिखा था उसके ७०० साल पहले से हिंदुस्तान में अज़ादारी हो रही थी और ख़ानक़ाह चाहे वह अजमेर, मनकापुर, देवा , किछौछा या छोटी ख़ानक़ाह बरैली शरीफ में हज़रात नियाज़ बेनियाज़ की मज़ार पर ताज़ियादरी बहुत बड़े पैमाने पर होती थी आला हज़रत खुद बा हयात थे उन्हों ने कुछ नहीं कहा।
    आप ने आलिम होने का फ़र्ज़ निभाते हुए ताज़िये के साथ ग़लत रस्मों के खिलाफ फतवा दिया। पर जब अवलिया की जमात इसे करती है मामला इल्मी नहीं इश्क़ी हो जाता है। सयद मूसा सुहाग जिनकी मज़ार अहमदाबाद में है वह आलिम होते हुए अपनी दाढ़ी कटवा कर औरतों का लिबास पहन कर महबूब इ इलाही को मानाने उनकी दरगाह पर बैठ गए। ये सब शरीयत के हिसाब से नाजायज़ है पर इश्क़ ने मजबूर कर दिया ये अमल करने को। कर यक़ीन हो गया होगा की मुरवाजा ताज़ियेदारी को हराम कहा ताज़ियेदारी को नहीं I अगर हम मसनवी ताज़िया बनाते हैं तो वह गुनाह नहीं होगा क्योंकि हमारे ख्याल में ये होता है की ये इमाम हुसैन की नक़ल है। अमल का दारोमदार नियत पर है। अब बनाने वाले की नियत साफ़ है वह इश्क़ इ हुसैन में ताज़िया बना रहा है तो जायज़ है। इन सब बारीकियों को समझने की ज़रुरत है। इश्क़ और तसव्वुर चीज़ की जाए वो अलग है।
    तो हम सब को रहबरों के रस्ते पर चलना चाहिए और अपनी ग़ुलामी का सबूत देते हुए ताज़ियेदारी जब तक हम ज़िंदा हैं करते रहना चाहिए।

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