कुर्बानी का जानवर न मिलने की सूरत में आयत्उल्ला अली सिस्तानी साहब का फ़तवा

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    *शिया मसायल : कोरोना की वजह से अगर जानवर न मिल सकें तो क्या किया जाये*? इस साल एक बड़ा सवाल ये किया जा रहा है कि कोरोना की वबा और महामारी फैलने की वजह से जानवरों की मंडी लगना मुश्किल है और मुमकिन है क़ुर्बानी के जानवर न मिल सकें तो ऐसी सूरत में क्या किया जाये ?
    *आयतुल्लाह सीस्तानी के फ़तवे की रौशनी में (ग़ैर हाज़ीर के लिये ) अगर क़ुर्बानी का जानवर मिलने में मुश्किल हो रही हो और इंसान क़ुर्बानी कराने की कुदरत व सकत रखता हो तो जानवर की क़ीमत ज़रूरत मंद व मुस्तहक़ मोमिनीन को सदक़ा दे*।
    क़ुर्बानी में क्योंकि शिरकत की इजाज़त है इसलिये इंसान को इख़्तेयार है कि चाहे तो सिर्फ़ अपनी तरफ़ से ही क़ुर्बानी करे और चाहे अपने घर वालों या दूसरे रिश्तेदारों के साथ मिल कर एक ही हैवान की क़ुर्बानी दे और अंदाज़ा लगा ले कि इस वक़्त एक हैवान की क़ीमत क्या होगी ? मिसाल के तौर पर एक हैवान कम से कम इस वक़्त 5000 से 6000 रुपये का होगा तो वो शख़्स इतनी रक़म अकेले या मिल कर क़ुर्बानी की जगह सदके की नीयत से मोमेनीन ग़रीब और मिस्कीन व मुस्तहक़ को दे ।
    अगर इंतेजामिया इजाज़त दे दे और मंडी लगे व जानवर आसानी से मिल जाये तो इंसान के लिये मुस्तहब ए ताकीदी है कि क़ुर्बानी करे लेकिन इस साल ऐसा होना ख़ास कर शहरों में मुश्किल लग रहा है तो इंसान क़ुर्बानी की जगह सदक़ा दे । इंशाअल्लाह उसको क़ुर्बानी के साथ ज़रूरतमंदों की मदद का भी अज्र मिलेगा …..
    *डाक्टर कल्बे सिब्तैन नूरी* लखनऊ , 21 जुलाई , 2020

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