क़ौम को नेता नहीं रहनुमा चाहिए!

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लेखिका रुबीना जावेद मुर्तुज़ा

जो कुछ हमारे साथ हो रहा है, तुम इसका मुशाहिदा कर रहे हो, बेशक दुनिया बदल गई है और इस ने अपना भेस भी बदल डाला है, दुनिया की नेकियों ने अपना मुंह मोड़ लिया है, इसमें जो कुछ भी बचा है बर्तन में बचे हुए झूठले पानी (तलछट) के सिवा कुछ नहीं है। क्या तुम नहीं देख रहे हो के हक़ पर अमल नहीं हो रहा है? और बातिल से रोका नहीं जा रहा है ऐसे हालात में मोमिन को लिक़ाये परवरदिगार का मुशताक़ होना चाहिए और यकीनन ऐसे हालात में मैं मौत को सआदत जालिमों के साथ जिंदगी को बदबक़ती समझता हूं।”
यह कलमात हुसैन अलैहिस्सलाम के हैं। क्या आज के हालात ऐसे नहीं हैं जिनका ज़िक्र इस ख़ुतबे में किया गया है? क्यों आज लोगों को हक़ की मदद करने के लिए अमादा नहीं किया जा रहा है? क्यों लोगों को जुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाने पर आमादा नहीं किया जा रहा है? जब के कर्बला का तारीख़ी वाक़या एक अज़ीम दरसगाह की शक्ल में हमारे पेशे नज़र है जिसका सबसे बड़ा दरस ही ज़ुल्म के खिलाफ़ आवाज़े एहतेजाज बुलंद करना है, और इस वाक़ये को सुनाने वाले भी कसीर तादाद में मौजूद हैं, इसके बावजूद समाज में ज़ुल्म परवान चढ़ रहा है और आवाम में बेहिसी है। ऐसा क्यों है?
इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए फ़रज़ी और असली रहनुमा के बीच के फर्क़ को समझना होगा। फर्जी रहनुमाओं की कारगर दी के लिए हम नेतागिरी का लफ्ज़ इस्तेमाल करेंगे क्योंकि उनकी तमाम कोशिशें दुनिया को हासिल करने की होती हैं।
नेतागिरी आसान है रहनुमाई मुश्किल। नेतागिरी दुनिया हासिल करने के लिए की जाती है, रहनुमाई ख़ुशनूदगीए परवरदिगार हासिल करने के लिए की जाती है, नेतागिरी में लोगों के जज्बात को भड़का कर उनको अपने पीछे चलने पर मजबूर किया जाता है जबकि रहनुमाई में हक़गोई में कोई रियायत नहीं की जाती, भले ही किसी को पसंद आए या न आए, रहनुमा तन्हा अपने अमल से इंसानियत की रहनुमाई की मिसाल पेश करते आए हैं तनहाई उनके हौसलों को पस्त नहीं करती।
क़ौमो की इमामत नेताओं के बस का काम नहीं है यह रहनुमाओं का अमल है । इमाम हुसैन अलैहिससलाम ने अपनी जान की क़सम खाकर इमाम की पहचान अपने उस ख़त में बताई है जो आपने कूफ़े के लोगों को उनके ख़त के जवाब में लिखा था। आपने फरमाया था कि,” मेरी जान की क़सम इमाम वही है जो किताब ए ख़ुदा के मुताबिक फ़ैसला करे, हक़ और इंसाफ क़ायम करे, दीन ए इलाही का पाबंद हो और अपनी जान को खुदा के लिए वक़्फ़ कर दे।” जब रहनुमाई किसी ऐसे शख्स के हाथों में होगी जिसमें यह ख़ुसूसियात पाई जाती हो तब ही हालात में बेहतरी आएगी। वरना गुज़िशता कुछ बरसों में जो सूरते हाल पेश आई है वह इनतेहाई अफ़सोसनाक है। एक तरफ तो जुल्म और ज़ियादती पर मुजरिमाना ख़ामोशी है, तो कभी जबरदस्ती की बातों को मुद्दा बनाकर (कभी नजफ़ की फ्लाइट, कभी अपने ही घर में अज़ादारी की परमिशन) क़ौम को जबरदस्ती हुकूमत और इंतजामियां का एहसानमंद बनाया जा रहा है। भीड़ के ज़रिए किए गए ग़रीबों के कत्लेआम पर कुशाई न करने वाले आर्टीकल 370 ( जो कि पूरी तरह सियासी मसला था) पर अपनी हिमायत करते नज़र आते हैं ।
इस गुफ़तगू का मक़सद यही है कि हम मौजूदा सूरते हाल को समझें हैं और इसके हल के बारे में भी सोचें । तो बात वाज़ेह है कि मौजूदा सूरते हाल वही है जो इमाम हुसैन अलैहिसलाम ने फ़रमाया है और इस मज़मून की शुरूआत वहीं से की गयी है । हल भी इमाम हुसैन अलैहिससलाम के ख़त में पेश कर दिया गया है ।

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