ईरान अरबों का दोस्त है या दुश्मन? रायुलयौम मे एक अरब टीकाकार का रोचक और सटीक विश्लेषण

    0
    211

    26/5/2020

    सन 1979 में ईरान में इस्लामी क्रांति सफल होती है और सफलता के तत्काल बाद आने वाली सरकार ने अरबों के सब से बड़े दुश्मन, इस्राईल से सारे रिश्ते खत्म करने का एलान करती है और इस्राईली दूतावास को खाली करवा कर फिलिस्तीनी संगठन को दे देती है और इस तरह से ईरान पहला गैर अरब देश बनता है जहां फिलिस्तीन का दूतावास बनाया गया हो।

    इस्राईल और अमरीका का जिस तरह से ईरान की नयी सरकार ने विरोध किया उसकी वजह से अमरीका ने इराक़ के शासक सद्दाम को ईरान पर हमला करने के लिए उकसाया जिसका सारा खर्चा, परशियन गल्फ के देशों ने दिया। ईरान व इराक़ का यह युद्ध 8 वर्षों तक जारी रहा जिसके दौरान दोनों तरफ के दस लाख से अधिक लोगों की जान गयी और युद्ध के अंत पर इराक़ और ईरान की अर्थ व्यवस्था को काफी नुकसान पहुंच चुका था, यह सब कुछ इस्राईल से दुश्मनी का नतीजा था। यही नहीं ईरान में जब से इस्लामी क्रांति सफल हुई तब से अमरीका और इस्राईल अरब देशों को और उनके संगठनों को ईरान के खिलाफ भड़काते रहे हैं ताकि शिया सुन्नी विवाद को हवा दें, वह दावा करते हैं कि ईरान, शिया धर्म को फैलाना चाहता है और इलाक़े के सभी अरब देशों को शिया देश बनाने की योजना रखता है। यह निश्चित रूप से हास्यास्पद दावा है क्योंकि स्वंय ईरान में दो करोड़ से अधिक सुन्नी मुसलमान रहते हैं तो ईरान को अगर शिया बनाने का इतना ही शौक होगा तो वह पड़ोस के अरब देशों के सुन्नियों को शिया बनाने से पहले अपने देश में मौजूद सुन्नियों को शिया बनाएगा।
    हमें यह भी मालूम है कि सऊदी अरब के पूर्वी क्षेत्रों में जैसे अलएहसा और अलक़तीफ और अलअवामिया में सब के सब शिया हैं जबकि बहरैन में शिया बहुसंख्य हैं तो फिर अगर ईरान सांप्रदायिकता चाहता तो इन लोगों को भड़का सकता था मगर ईरान ने कभी भी अपने पड़ोसी देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया यहां तक कि बहरैन में होने वाले प्रदर्शनों का नैतिक समर्थन तो उसने किया लेकिन इसके अलावा किसी प्रकार की मदद नहीं की जिसकी वजह से बहरैन में सरकार विरोधी मोर्चे के कुछ संगठनों ने ईरान के प्रति नाराज़गी भी प्रकट की।

    बहुत से लोग ईरान पर यह आरोप लगाते हैं कि उसने अरब देशों में अपने समर्थक सशस्त्र संगठन बनाए हैं जैसा कि लेबनान में हिज़्बुल्लाह या इराक़ में स्वंय सेवी बल।

    यह एक सही बात है लेकिन इसे समझने की ज़रूरत है। ईरान ने इन देशों में इन संगठनों के गठन में मदद की है लेकिन उनके अपने देश के हितों की ही सुरक्षा के लिए। जब अस्सी के दशक में ईरान ने लेबनान में हिज़्बुल्लाह के गठन में मदद की तो उसका उद्देश्य लेबनानी इलाक़ों को इस्राईली क़ब्ज़े से स्वतंत्र कराना था और यही हुआ, हिज़्बुल्लाह दक्षिणी लेबनान से इस्राईल को भगा दिया अब अगर ईरान ने इस तरह से सहयोग न किया होता तो आज तक लेबनानी इलाक़ों पर इस्राईल का क़ब्ज़ा रहता, हिज़्बुल्लाह का गठन लेबनान में हुआ और उसने लेबनानी इलाक़ों को स्वतंत्र कराया न कि ईरानी इलाक़ों को। हिज़्बुल्लाह ने आज तक तेहरान में कोई अभियान नहीं किया और न ही कभी ईरान ने हिज़्बुल्लाह संगठन को अपनी मदद के लिए बुलाया। ईरान ने हिज़्बुल्लाह को इस्राईल से मुकाबला करने के लिए बनाया था जिसने लेबनान के इलाक़ों पर गैर कानूनी रूप से क़ब्ज़ा कर रखा था।
    जहां तक इराक़ की बात है तो वहां भी ईरान ने स्वंय सेवी बल ” अलहश्दुश्शाबी” के गठन में मदद की। आज बहुत से लोग आरोप लगाते हैं कि ईरान ने इराक़ पर एक तरह से अपना प्रभाव पूरी तरह से जमा लिया है। यह बिल्कुल गलत बात है। जब ईरान और इराक में दुश्मनी थी तो उस समय भी ईरान ने इराक़ पर अमरीकी हमले का विरोध किया और ईरान के तत्कालीन राष्ट्रपति ने इराक पर अमरीकी हमले के कुछ दिन पहले खुल कर विरोध का एलान किया था। अमरीकी सेना ने इराक पर हमला, इराक़ के पड़ोसी अरब देशों से किया था न कि ईरान से। उसके बाद इराक़ में ईरान की जो भूमिका रही है उस पर कुछ आलोचकों की बातें सही हो सकती हैं लेकिन कुल मिलाकर यदि देखा जाए तो इराक़ में ईरान की भूमिका बेहद सकारात्मक रही है। जब इराक़, भयानक आतंकवादी संगठन दाइश से लड़ रहा था तो यह ईरान ही था जिसने उसकी भरपूर और खुल कर मदद की। सन दो हज़ार चौदह में इराक के दो तिहाई भाग पर दाइश का क़ब्ज़ा हो चुका था तब ईरान आगे आया और शहीद जनरल क़ासिम सुलैमानी ने इराक़ी स्वंय सेवी बल अलहश्दुश्शाबी के गठन मे मदद की जिसके बल पर इराक़ ने दाइश को सन 2018 में इराक से खदेड़ दिया जबकि अमरीकी राष्ट्रपति बाराक ओबामा का कहना था कि दाइश को हराने में दसियों साल लगेंगे।
    आज भी ईरान इतने दबाव और प्रतिबंधों के बावजूद फिलिस्तीन और फिलिस्तीनियों के साथ खड़ा है जो अरब हैं। अगर आज वह इस्राईल के साथ संबंध स्थापित कर ले तो उस पर से सारे प्रतिबंध हट जाएंगे और उसकी सारी समस्याएं खत्म हो जाएंगी और वह अतीत की तरह एक बार फिर इलाक़े में अमरीका व इस्राईल का सब से बड़ा और मज़बूत घटक बन जाएगा लेकिन वह यह कभी नहीं कर सकता और फिलिस्तीनियों के साथ खड़ा है, आज वह फिलिस्तीनियों को जिस तरह से हथियार दे रहा है, धन दे रहा है उस तरह से किसी अरब देश ने नहीं किया और अब तो अधिकांश अरब देश इस्राईल से हाथ मिलाने और फिलिस्तीन को बेचने के लिए एक दूसरे को पीछे छोड़ रहे हैं।

    इस लिए हमारा कहना है कि अरबों की भलाई इसी में है कि वह ईरान के साथ हो जाएं, ईरान का हाथ थामें और आपसी विवाद को भुला कर इस्राईल को मज़बूत करने का काम करना छोड़ दें क्योंकि ईरान इलाक़े का मुख्य देश है और अरबों की तरह उसका पुराना इतिहास है लेकिन इस्राईल, विदेशी है जिसे इलाक़े को बर्बाद करने के लिए बनाया गया है।

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here