इंटरस्टीर्षियल लंग डिजीज (आई0एल0डी0) के लिए भारतीय गाइडलाइनय

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    इंटरस्टीषियल लंग डिजीज (आई0एल0डी0) के कई बीमारियों एक बडे़ समूह का वर्णन करता है। जिनमे से अधिकांष फेफडे़ मे फाइब्रोसिस का करण बनते है। आई0एल0डी0 बीमारी से जुडे़ फाइब्रोसिस अंततः आपके रक्त प्रवाह मे सांस लेने और पर्याप्त अॅाक्सीजन प्राप्त करने की क्षमता को प्रभावित करता है। यह दो सौ से अधिक फेफड़ो की बीमारियों के एक समूह को संदर्भित करता है। जो कि एक साथ समूहीकृत होते है क्योंकि वे लक्षणों निदान और उपचार की विषेषताएँ आपस में साझा करते है। इन बीमारियों के समूह को कभी कभी डिफयूज पैरेन्काइमल लंग डिजीज (डी0पी0एल0डी0) भी कहा जाता है।
    आई0एल0डी0 की भारतीय गाइडलाईन: समय की आवष्यकताः-
    भारत मे आई0एल0डी0 को आमतौर पर तपेदिक (टी0बी0) के रूप में गलत निदान कर दिया जाता है। श्वंास रोग विषेषज्ञ के परामर्ष करने से पहले ही रोगी को टी0बी0 के उपचार के कई कोर्स अज्ञानवष दे दिए जाते हैं। क्योंकि आई0एल0डी0 और तपेदिक के मुख्य लक्षण एक जैसे होते है। आई0एल0डी0 के निदान और उपचार से सम्बंधित भ्रम से बचने के लिए 01/07/2020 को इंण्यिन चेस्ट सोसाइटी (आई0सी0एस0) और नेषनल कालेज अॅाफ चेस्ट फिजिषयन (एन0सी0सी0पी0) द्वारा आई0एल0डी0 के प्रबंधन पर गाइडलाइन को स्नदह प्दकपं श्रवनतदंस मे प्रकाषित किया गया है। एतिहासिक तौर पर इस गाइडलाईन को अमेरिकन थोरेसिक सोसाइटी और एषियाई पैसिफिक सोसाइटी अॅाफ रेस्पाइरोलोजी द्वारा अनुमोदन एवं समर्थन किया गया है। यह पल्मोनोलोजी के भारतीय इतिहास में पहली बार हुआ है कि दो बहुत ही महत्वपूर्ण अंतराष्ट्रीय चिकित्सा सोसाइटीज ने किसी भी बीमारी क लिए भारतीय गाइडलाइन का समर्थन किया है।
    नेषनल कालेज अॅाफ चेस्ट फिजिषियन (एन0सी0सी0पी0) 2019-2020 के अध्यक्ष डा0 सूर्यकान्त, डा0 वीरेन्द्र सिंह (जयपुर) तथा डा0 गणेष रघु (वाषिगंटन, अमेरिका) के नेतृत्व एवं मार्गदर्षन में देष के प्रख्यात विषय विषेषज्ञों की सहायता से ये गाइडलाइन तैयार की गयी है।
    आई0एल0डी0 के कारणः-
    कुछ कारक व्यक्ति को आई0एल0डी0 के रोगो के लिए अतिसंवेदनषील बनाते है, यह मुख्य रूप से व व्यस्कों और बुजुर्गों को प्रभावित करता है। जो लोग खेती, खनन और निर्माण कार्य मे काम करते हैं, उनको अधिक जोखिम होता है। धूम्रपान और गैस्ट्रोओसोफेगल रिफलक्स के साथ भी आई0एल0डी0 का सम्बन्ध होता है।
    यह बीमारी कई विषों और प्रदूषकों के दीर्घकालिक सम्पर्क में आने से भी होती है। इसमें सिलिका, धूल, एस्बेस्टस फाईबर, अनाज की धूल, पक्षी और जानवरों की बूदें विकिरण उपचार, इंडोर हॅाट टब आदि के कारण होती है।
    कई दवाएँ भी आई0एल0डी0 का कारण बन सकती है, ये कीमोथेरेपी दवाएं (मेथेटेªक्सेट और साइक्लोफॅास्माईड) हो सकती है। दिल की दवाएं जैसे अमियोडोरेन या प्रोपानोलोन, एटिबायोटिक्स जैसे नाइट्रोफयुरेटायन और एथमब्यूटाल और एंटी इन्फलेमेटरी दवाएं जैसे रिटुक्सीमैब या सल्फासालाजीन भी हो सकती है। कई अॅाटोइम्यून बीमारियों से भी हो सकती है जैसे रयुमैटायॅाड आरथराइटिस तथा स्कलेरोडर्मा। लेकिन कई बार आई0एल0डी0 अज्ञात कारणो से भी हो सकती है। यदि कारण अज्ञात है तो इसे इंडियोपैथिक पल्मोनरी फाइबंरोसिस (आई0पी0एफ0) के रूप में जाना जाता है।
    आई0एल0डी0 के लक्षणः
    आई0एल0डी0 का पहला लक्षण लगातार सूखी खासी आना है। बाद में रोगी को सांस की तकलीफ हो सकती है। जो तेजी से बढ़ जाती है। कुछ प्रकार के आई0एल0डी0 से घरघराहट, सीने मे दर्द, और थूक मे खून हो सकता है। बाद मे रोगी बेड और अॅाक्सीजन पर निर्भर हो सकता है। इन लक्षणों के कारण चिकित्सक अक्सर टी0बी0 अन्य श्वसन, समस्याओं जैसे अस्थमा, सी0ओ0पी0डी0 आदि से भ्रमित हो सकते है। बीमारी के अंतिम चरण में इस का असर हृदय व अन्य अंगो पर भी पड़ सकता है।
    आई0एल0डी0 का निदान:-
    सांस की तकलीफ या खासी के कारण आमतौर पर आई0एल0डी0 की बीमारी वाले लोग डाक्टर के पास जाते है। सटीक निदान के लिए चेस्ट एक्स रे, हाई रेजोल्यूषन सी0टी0 स्कैन, लंग फंक्षन टेस्ट और कभी कभी बांकोस्कोपी और लंग बायोप्सी की जरूरत पड़ सकती है। अधिकांष मामलो मे चेस्ट का हाई रिजोलूषन, सी0टी0 स्कैन आई0एल0डी0 के निदान के लिए एक स्वर्ण मानक परीक्षण (गोल्ड स्टैन्डर्ड टेस्ट) माना जाता है।
    एक बार निदान की पुष्टि हो जाने के बाद उपचार शुरू किया जा सकता है, आई0एल0डी0 मे ज्ञात कारणो से हम अंतनिर्हित कारणो का इलाज करेेगे। आई0एल0डी0 रोगी क एक्यूट एक्सेसरबेषन मेें कॅार्टिकोस्टेराॅइड के साथ इलाज किया जा सकता है। अज्ञात कारणो के साथ आई0एल0डी0 मे दो दवाएं यू0एस0एफ0डी0ए0 द्वारा अनुमोदित है ये है परफेनिडोन और निंटेडेनिब। अंतिम अवस्था मे रोगी का उपचार अॅाक्सीजन थेरेपी से किया जा सकता है। फेफड़ो का प्रत्यारोपण स्पष्ट रूप से एक कारगर उपचार है जिसे दीर्घकालिक अॅाक्सीजन थेरेपी के रोगियो मे किया जा सकता है।
    भारतीय आई0एल0डी0 रजिस्ट्रीः-
    भारत मे आई0एल0डी0 की विषेषताओं को जानने के लिए एक अध्ययन किया गया था। तब भारत में विभिन्न प्रकार के आई0एल0डी0 के प्रचलन के बारे मे सीमित ज्ञान था। इंण्डिन चेस्ट सोसाइटी 2016-2017 के अध्यक्ष डा0 सूर्यकान्त के कुषल मार्गदर्षन और नेतृत्व मे इस रजिस्ट्री का 15 मार्च 2017 को प्रतिष्ठित अंतराष्ट्रीय पत्रिका, अमेरिकन जर्नल, अॅाफ रेस्पाइरेटरी एंड क्रिटिकल केयर मेडिसिन मे प्रकाषन हुआ। यह अध्ययन में 19 भारतीय शहरों के 27 केन्द्रो में किया गया था। जिसमें कुल 1084 रोगियो को शामिल किया गया। इस अध्ययन में विभिन्न प्रकार आई0एल0डी0 का विवरण इस प्रकार था। 47.3 प्रतिषत हायपर सेंसटिविटी न्यूमोनाईटिस (एच0एस0आई0एल0डी0), 13.9 प्रतिषत कनेक्टीव टिषु डिसओडर सम्बंधित आई0एल0डी0 (सी0टी0डी0 आई0एल0डी0) 13.7 प्रतिषत इडियोपैथिक पलमोनरी फाईबा्रेसिस (आई0पी0एफ0), 8.5 प्रतिषत इंडियोपैथिक नॅान स्पेसिफिक इंटरस्टिषियल नयूमोनाईटिस (आई0एन0एस0आई0पी0), 7.8 प्रतिषत सारकोडोसिस, 03 प्रतिषत न्यूमोकोनियोसिस और 5.7 प्रतिषत अन्य । इस अध्ययन मे निष्कर्ष निकाला गया था कि भारत में हाईपर सेन्स्टििविटी न्यूमोनाइटिस (एच0एस0आई0एल0डी0) सबसे ज्यादा पायी जाने वाली आई0एल0डी0 है और इसमें लगभग आधे लोगो मे एयर कुलर कारण होता है। यह अध्ययन न केवल भारतीय चिकित्सा समाज के लिए बल्कि पूरी दुनिया के लिए अॅाखो की पट्टी खोलने जैसा था।

    आई0एल0डी0 गाइडलाइन के प्रमुख सुझावः-
    1 केवल लक्षणों के आधार पर या एक्स-रे के धब्बे को देखकर ही टी0बी0 घोषित न की जाये, बल्कि टी0बी0 के लिए बलगम की जांच तथा आई0एल0डी0 के लिए हाई रिजूलेषन कम्पयूटेड टोमोग्राफी की जांच की जाए, जिससे आई0एल0डी0 की बीमारी को गलती से टी0बी0 न समझा जाये।
    2 टी0बी0 घोषित करने से पहले बलगम की जांच में सी0बी0नेट या ट्रूनेट भी जांच अवष्य करायी जायें।
    3 आई0एल0डी0 के रोगी में जोखिम कारकों की खोज जैसे, गठिया रोग, ध्रूम्रपान, कूलर का इस्तेमाल, पषु-पक्षियों का लम्बा साथ, खनन तथा अन्य एसे व्यवसाय जिसमें सिलिका या एस्बेस्टस की धूल उड़ती है, इन सभी की विषेष जानकारी की जाये।
    4 आई0एल0डी0 के रोगी में क्लबिंग भी देखनी चाहिए। क्लबिंग में हाथ के नाखूनो में उभार हो जाता है।
    5 आई0एल0डी0 के रोगियो के निदान हेतु हाई रिजूलेषन कम्पयूटेड टोमोग्राफी एक गोल्ड स्टैन्टर्ड जंाच है।
    6 जब हाई रिजूलेषन कम्पयूटेड टोमोग्राफी से आई0एल0डी0 का पता न चले तभी ब्रांकोस्कोपी या बायोप्सी जैसी जांच करानी चाहिए।
    7 आई0एल0डी0 का कारण ज्ञात हो तो सर्वप्रथम उसका उसका उपचार करना चाहिए।
    8 आई0एल0डी0 का कारण ज्ञात न हो तो दो दवाएं, निन्टेडेनिब या परफेनिडोन उपयोग मे लायी जानी चाहिए।
    9 आई0एल0डी0 के रोगी को अटैक (।बनजम म्गंबमतइंजपवद के समय) स्टीरॅायड दवाएं दी जानी चाहिए।
    10 आई0एल0डी0 की अंतिम अवस्था में अॅाक्सीजन थेरेपी व फेफड़ा प्रत्यारोपण उपयोगी है।

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